किशोर कुमार कौशल

गाँव के एक छोटे बच्चों ने
अपने बाबा से पूछा-बाबा,
गांँव और शहर में क्या अंतर है?
बाबा बोले-बेटा,
तुम्हारा प्रश्न है बड़ा टेढ़ा
फिर भी बताता हूँ-
जहांँ बड़े सवेरे चिड़ियाँ चहचहाती हैं
जहाँ गाय-भैंसें तालाब में नहाती हैं
जहांँ सावन लगते ही झूले पड़ जाते हैं
बालाओं के गीत मन में गड़ जाते हैं
जहांँ अब भी सुबह-शाम
होती है राम-राम
जहांँ लोग कष्टों में,अभाव में जीते हैं
रूखी-सूखी प्रेम से खा
मस्त हो जीते हैं
जहांँ बच्चे खेलते हैं
नंगे बदन,नंगे पांँव
जहांँ पथिकों के लिए
पीपल की छांँव है
मेरे बच्चे,वह गांँव है

और जहांँ
सूरज निकलने से पहले वाहनों की चीख-पुकार
गाड़ियों की गड़गड़ाहट
राशन की लंबी कतार
जहांँ कदम-कदम पर होती दुर्घटना है
वह क्या दिल्ली,क्या मुंबई, क्या पटना है
जहांँ आदमी को मरता देख लोग मुंँह फेर लेते हैं
पड़ोसी भूखा हो तो
अपना परदा गेर लेते हैं
जहांँ आग है,बिजली है,धुआँ है,ग़म है
जहांँ भागमभाग,बेचैनी अधिक
फु़रसत कम है
जहांँ मिनट है,घंटा है,घड़ी है,पहर है
मेरे बच्चे,वहांँ शहर है
यहाँ कुआँ है,वहाँ धुआँ है
यहाँ मोर है,वहाँ शोर है
यहांँ राग है,वहाँ आग है
यहांँ काम है,वहाँ नाम है
गांँव-गांँव होता है
गांँव ठाँव होता है
गांँव छाँव होता है
शहर शहर होता है
शहर कहर होता है
शहर जहर होता है
गांँव गांँव होता है
शहर शहर होता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *