सरकार द्वारा दारू व्यवसाय, बीयर बार, शस्त्र लाइसेंस समेत पासपोर्ट भी जारी किया जा चुका है। 

जौनपुर। उत्तर प्रदेश के जौनपुर जनपद के शाहगंज के पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष व भाजपा नेता प्रदीप जायसवाल के बारे में कुछ ऐसा खुलासा हुआ जिससे राजनैतिक गलियारों में हलचल पैदा हो गई।भाजपा नेता प्रदीप जायसवाल के विरुद्ध दर्जनों आपराधिक मुकदमें पुलिस की डायरी में दर्ज है। इस बात की जानकारी अधिकतम लोगों को नहीं है।

 यह मामले धोखाधड़ी, मारपीट जबरन जमीन कब्जाने समेत गंभीर अपराधों से जुड़े बताए जाते हैं, जो उनकी छवि को लगातार धूमिल करते आ रहे हैं। इतना ही नहीं, प्रदीप जायसवाल जैसे आपराधिक पृष्ठ भूमि वाले व्यक्ति के पास कई कई वैध लाइसेंस मौजूद है, जो कई प्रकार की जांच रिपोर्ट के बाद जारी किया जाने का प्रावधान है, प्रदीप जायसवाल के विरुद्ध शाहगंज कोतवाली में कुल 6 मुकदमे दर्ज है जिनका मुकदमा अपराध संख्या 933/2013

065/22, 150/22, 189/22,376/23 022/24 है और खुटहन थाने में 550/17 है, जिसमे प्रदीप जायसवाल ने अपने धन बल और सत्ता शासन के प्रभाव से कई मुकदमों में या तो अपना नाम निकलवाने में और कई मुकदमों को फाइनल रिपोर्ट लगवाने में कामयाब हो गए है।

सुरक्षा एजेंसियों की सख्ती के बावजूद जारी किया गया। स्थानीय निवासियों का कहना है कि ऐसे व्यक्ति को हथियारों का अधिकार देना, सामान्य जनता के लिए खतरा पैदा करता है।

प्रदीप जायसवाल की पत्नी गीता जायसवाल भी इसी कड़ी का हिस्सा बनी हुई हैं। गीता पर भी कई मुकदमे दर्ज हैं, जो विभिन्न विवादों से संबंधित हैं। हाल ही में उन्हें बीयर बार चलाने का लाइसेंस मिलने की खबर ने क्षेत्र में हड़कंप मचा दिया है। यह लाइसेंस सामाजिक और नैतिक मूल्यों के खिलाफ माना जा रहा है, खासकर जब परिवार पर पहले से ही कानूनी कार्रवाइयों का दबाव हो। गीता की भूमिका शाहगंज नगरपालिका में भी चर्चित रही है, जहां वे चेयरमैन पद पर आसीन रह चुकी हैं। ऐसे में परिवार की यह दोहरी भूमिका सवालों के घेरे में आ गई है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि एक मुकदमे के बाद भी किसी व्यक्ति को चरित्र प्रमाण पत्र या पासपोर्ट प्राप्त करना मुश्किल हो जाता है, तो सात मुकदमों के बाद प्रदीप जायसवाल को ये सभी लाइसेंस कैसे मिल गए? सरकारी नियमों के अनुसार, आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों के लिए हथियार या शराब संबंधी व्यवसाय की अनुमति कठोर जांच के बाद ही दी जाती है। लेकिन यहां प्रक्रिया में कोई बाधा नजर नहीं आ रही। क्या यह महज प्रशासनिक चूक है या जानबूझकर की गई ढील? स्थानीय कार्यकर्ता इसे सिस्टम की कमजोरी का प्रतीक बता रहे हैं।

यह मामला न केवल शाहगंज, बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश के प्रशासन पर सवाल खड़े करता है। क्या सरकार और स्थानीय प्रशासन की मिलीभगत से ऐसे प्रभावशाली लोग बच निकलते हैं? जनता को न्याय कब मिलेगा, यह सोचने का समय आ गया है। यदि ऐसी अनियमितताएं जारी रहीं, तो आम आदमी का विश्वास पूरी तरह टूट जाएगा। संबंधित विभागों से तत्काल जांच की मांग उठ रही है, ताकि सच्चाई सामने आ सके।

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