जौनपुर से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने उत्तर प्रदेश की सियासत और चुनावी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। शाहगंज विधानसभा क्षेत्र के एक मतदान केंद्र से जुड़ी यह घटना उस वक्त चर्चा में आई, जब बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) ने खुद स्वीकार किया कि उन्हें मतदाता सूची से नाम हटाने के लिए फॉर्म-7 सौंपा गया था। मामला सामने आने के बाद प्रशासनिक स्तर पर भी हलचल तेज हो गई है।
यह घटनाक्रम ऐसे समय पर सामने आया है, जब समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव लगातार भारतीय जनता पार्टी पर आरोप लगा रहे हैं कि फॉर्म-7 के जरिए विपक्षी दलों के समर्थक मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से कटवाए जा रहे हैं। जौनपुर का यह मामला उन आरोपों को और हवा देता नजर आ रहा है।
- शाहगंज विधानसभा के बूथ नंबर 332 से जुड़ा है पूरा मामलापूरा मामला
- फॉर्म-7 विवाद पर प्रशासन का जवाब, क्या बोले उप जिला निर्वाचन अधिकारी
- अखिलेश यादव के आरोपों पर प्रशासन की सफाई
- BLO शशिबाला का बयान, “नाम काटने का दबाव था लेकिन नियम नहीं तोड़ूंगी”
- फॉर्म-7 को लेकर क्यों बढ़ रहा है राजनीतिक विवाद
- चुनावी माहौल में बढ़ी सियासी गर्मी, आगे क्या?
शाहगंज विधानसभा के बूथ नंबर 332 से जुड़ा है पूरा मामलापूरा मामला
जौनपुर जिले के शाहगंज विधानसभा क्षेत्र के पोलिंग बूथ संख्या 332, कानामऊ गांव से जुड़ा हुआ है। यहां की बीएलओ शशिबाला उपाध्याय ने स्वीकार किया है कि उन्हें बीजेपी के एक बूथ अध्यक्ष की ओर से फॉर्म-7 सौंपा गया था। यह फॉर्म कुल 17 मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाने के लिए दिया गया था।
आरोप है कि जिन मतदाताओं के नाम हटाने की कोशिश की गई, वे समाजवादी पार्टी के समर्थक थे और इनमें अधिकांश अल्पसंख्यक समुदाय से जुड़े बताए जा रहे हैं। विपक्ष का दावा है कि यह कार्रवाई ड्राफ्ट मतदाता सूची में जानबूझकर हस्तक्षेप करने की कोशिश का हिस्सा थी।
बीएलओ शशिबाला उपाध्याय ने साफ तौर पर कहा कि उन्होंने किसी भी मतदाता का नाम नहीं काटा है और न ही वे ऐसा करेंगी। उन्होंने यह भी बताया कि इस बारे में उन्होंने संबंधित बीजेपी बूथ अध्यक्ष को पहले ही अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी थी।
फॉर्म-7 विवाद पर प्रशासन का जवाब, क्या बोले उप जिला निर्वाचन अधिकारी
मामले को लेकर शाहगंज के उप जिला निर्वाचन अधिकारी और उपजिलाधिकारी कुणाल गौरव ने कहा कि उन्हें अभी तक लिखित रूप में इस तरह की कोई शिकायत नहीं मिली है। हालांकि, एक-दो लोगों की ओर से मौखिक रूप से इस तरह की बातें संज्ञान में आई हैं।
उप जिला निर्वाचन अधिकारी ने स्पष्ट किया कि जिन कर्मचारियों को मतदाता सूची के कार्य में लगाया गया है, उन्हें पूरा प्रशिक्षण दिया गया है। उन्हें सख्त निर्देश दिए गए हैं कि किसी भी तरह की गड़बड़ी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। अगर कोई कर्मचारी नियमों का उल्लंघन करता पाया गया, तो उस पर तुरंत कार्रवाई की जाएगी।
उन्होंने यह भी कहा कि केवल फॉर्म-7 देने से किसी मतदाता का नाम अपने आप नहीं कट जाता। इसके लिए जांच और सत्यापन की पूरी प्रक्रिया होती है। बीएलओ और उनके सुपरवाइजर दोनों स्तर पर सत्यापन किया जाता है, उसके बाद ही कोई फैसला लिया जाता है।
अखिलेश यादव के आरोपों पर प्रशासन की सफाई
समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव द्वारा लगाए गए आरोपों को लेकर उप जिला निर्वाचन अधिकारी कुणाल गौरव ने कहा कि फिलहाल उनकी जानकारी में ऐसा कोई मामला नहीं है, जिसमें किसी बीएलओ ने अवैध रूप से मतदाता का नाम हटाया हो।
उन्होंने दो टूक कहा कि अगर कहीं से भी ऐसी पुख्ता जानकारी मिलती है, तो उस पर सख्त कदम उठाए जाएंगे। प्रशासन का कहना है कि राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप उनका विषय नहीं है, लेकिन अगर कोई कर्मचारी गलत करता है, तो उसे बख्शा नहीं जाएगा।
BLO शशिबाला का बयान, “नाम काटने का दबाव था लेकिन नियम नहीं तोड़ूंगी”
इस पूरे मामले में सबसे अहम बयान बीएलओ शशिबाला उपाध्याय का माना जा रहा है। उन्होंने कैमरे के सामने स्वीकार किया कि उन्हें बीजेपी के एक बूथ अध्यक्ष ने 17 मतदाताओं के नाम हटाने के लिए फॉर्म-7 दिया था।
शशिबाला ने कहा कि उन्होंने साफ मना कर दिया है कि वे बिना नियम और सत्यापन के किसी का नाम नहीं काटेंगी। उन्होंने यह भी कहा कि मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया पूरी तरह कानूनी है और उसमें किसी भी तरह का दबाव स्वीकार नहीं किया जा सकता।
बीएलओ का यह बयान सामने आने के बाद राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। विपक्ष इसे अपने आरोपों की पुष्टि बता रहा है, जबकि सत्तारूढ़ दल की ओर से अभी तक इस पर कोई विस्तृत प्रतिक्रिया नहीं आई है।
फॉर्म-7 को लेकर क्यों बढ़ रहा है राजनीतिक विवाद
फॉर्म-7 वह प्रक्रिया है, जिसके जरिए किसी मतदाता के नाम को मतदाता सूची से हटाने के लिए आपत्ति दर्ज की जाती है। चुनाव आयोग के नियमों के अनुसार, इस फॉर्म पर कार्रवाई से पहले संबंधित मतदाता का सत्यापन और सुनवाई जरूरी होती है।
अखिलेश यादव का आरोप है कि इस प्रक्रिया का दुरुपयोग कर बीजेपी विपक्षी दलों के समर्थकों, खासकर पीडीए समुदाय और अल्पसंख्यकों को निशाना बना रही है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर सिलसिलेवार कई पोस्ट कर कहा है कि कई मतदाताओं को यह तक पता नहीं कि उनके नाम पर आपत्ति दर्ज कराई गई है, जबकि उनके सभी दस्तावेज सही हैं।
जौनपुर का यह मामला इन आरोपों के बीच सामने आया है, जिससे चुनावी निष्पक्षता को लेकर सवाल और गहरे हो गए हैं।
चुनावी माहौल में बढ़ी सियासी गर्मी, आगे क्या?
जौनपुर में सामने आया यह मामला सिर्फ एक बूथ या एक विधानसभा तक सीमित नहीं माना जा रहा। विपक्ष इसे बड़े पैमाने पर चल रही कथित साजिश का उदाहरण बता रहा है, जबकि प्रशासन नियमों और प्रक्रिया का हवाला देकर स्थिति को नियंत्रित रखने की कोशिश कर रहा है।
अब देखना होगा कि प्रशासन इस मामले की औपचारिक जांच करता है या नहीं और क्या संबंधित बूथ अध्यक्ष से पूछताछ होती है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा प्रदेश की राजनीति में और तूल पकड़ सकता है।

