By using this site, you agree to the Privacy Policy and Terms of Use.
Accept
Akhand Rashtra NewsAkhand Rashtra NewsAkhand Rashtra News
  • होम
  • राज्य
    • उत्तराखंड
    • बिहार
    • पश्चिम बंगाल
    • मध्य प्रदेश
    • गुजरात
    • महाराष्ट्र
    • उत्तर प्रदेश
  • देश
  • विदेश
  • राजनीति
  • अपराध
  • साहित्य
  • धर्म
  • एक्सक्लूसिव
  • सम्पादकीय
  • ई पेपर
Reading: एरडोगन की नव साम्राज्यवादी कट्टर सोच और तुर्की के बहिष्कार की वजह
Share
Notification Show More
Font ResizerAa
Akhand Rashtra NewsAkhand Rashtra News
Font ResizerAa
  • होम
  • राज्य
    • उत्तराखंड
    • बिहार
    • पश्चिम बंगाल
    • मध्य प्रदेश
    • गुजरात
    • महाराष्ट्र
    • उत्तर प्रदेश
  • देश
  • विदेश
  • राजनीति
  • अपराध
  • साहित्य
  • धर्म
  • एक्सक्लूसिव
  • सम्पादकीय
  • ई पेपर
Have an existing account? Sign In
Follow US
© 2008 - 2026 Akhand Rashtra News All Rights Reserved. Proudly Made By Akshant Media Solution
Akhand Rashtra News > सम्पादकीय > एरडोगन की नव साम्राज्यवादी कट्टर सोच और तुर्की के बहिष्कार की वजह
सम्पादकीयसाहित्य

एरडोगन की नव साम्राज्यवादी कट्टर सोच और तुर्की के बहिष्कार की वजह

Adminakhandrashtra
Last updated: June 16, 2025 9:59 am
Adminakhandrashtra
9 months ago
Share
एरडोगन की नव साम्राज्यवादी कट्टर सोच और तुर्की के बहिष्कार की वजह
SHARE

– प्रोफेसर शांतिश्री धुलीपुड़ी पंडित कुलगुरू जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय

“तुर्की की घटती विश्वसनीयता और आतंक नेटवर्क में भागीदारी न तो पाकिस्तान से शुरू होती है और न ही खत्म होती है। बल्कि हाल ही के क्षेत्रीय संकटों में पूरी तरह से पर्दाफाश हो गई।”

पाकिस्तान से उत्पन्न सीमापार आतंक के खिलाफ जवाबी कार्रवाई के रूप में, भारत के ऑपरेशन सिंदूर ने आतंकवादियों के ठिकानों को खत्म करने का साहसी कार्य किया है। इस सैन्य अभियान ने एक तकनीकी, वैचारिक, कूटनीतिक और बहुराष्ट्रीय सहयोग के मापदंडों का पर्दाफाश भी किया है। तुर्की इसमें मुख्य रूप से पर्दाफाश हुआ है। आज का तुर्की मुस्तफा कमाल अतातुर्क के आधुनिकता वाले प्रगतिशील दृष्टिकोण को सिर्फ नकार कर इस्लामिक कट्टरता का झंडाबरदार बना है, बल्कि अतातुर्क की कब्र पर खड़ा होकर, राष्ट्रपति एर्दोगान के 21वीं सदी में एक नव साम्राज्यवादी और नव ओटोमन सुलतान बनने के आकांक्षाओं के तहत कार्य कर रहा है। उनके बयान और नीतियों से लगता है कि वे वैश्विक जेहादी संगठनों के अप्रत्यक्ष नेता बनना चाहते हैं।

तुर्की का पाकिस्तान की ड्रोन क्षमता का आधुनिकीकरण, विशेष रूप से बायराक्टर ड्रोन देना, पाकिस्तान के लिए महत्त्वपूर्ण रहा है। केवल निगरानी ड्रोन ही नहीं, बल्कि बायराक्टर, पाकिस्तान के सेना-जिहादी संगठनों के हाथों में हवाई हमलों के अभियान का उपकरण बन गए हैं। ये घुसपैठ की सुविधा प्रदान करते हैं और भारत तथा उसके पड़ोसी के बीच वर्तमान प्रॉक्सी युद्ध की संभावनाओं को आगे बढ़ाते हैं। इस प्रकार तुर्की भारतीय जीतों के विरुद्ध कार्य कर रहा है। हाल ही अहमदाबाद में दुर्घटनाग्रस्त हुए एयर इंडिया के AI 171 की कई तकनीकी सेवाएं तुर्की की कंपनियां देती हैं। इसके कारण किसी बड़ी साजिश की संभावना बनी हुई है। संदेह के बादल गहरे हो रहे हैं।

तुर्की का पाकिस्तान को अदृढ़ कूटनीतिक और राजनीतिक समर्थन जारी है। इसलिए, भारतीय कंपनियों, व्यापारियों, ट्रेड यूनियनों, शैक्षणिक संस्थानों और निजी खिलाड़ियों ने तुर्की और उसके कार्यक्रमों, उत्पादों एवं सेवाओं का बहिष्कार करना शुरू कर दिया है। जागरूक लोकतांत्रिकों के लिए की दृष्टि में यह कदम भय और दबाव पैदा कर सकता हैं। पहलगाम आतंकवादी हमले के पीड़ित अभी ही न्याय और जवाबदेही की खोज में हैं। उनके लिए यह तुर्की और ईरान की कठपुतली बना पाकिस्तान में पल रहे षड्यंत्रकारी जेहादी तत्वों को दंडित करना आवश्यक है। अतः, हमें तुर्की-पाकिस्तान गठबंधन को पैनी नजर से देखना होगा। इसे भारत एवं भारतीयों के हितों के साथ तुलनात्मक दृष्टि से देखना चाहिए।

भारत में तुर्की का विस्तार
प्रसिद्ध तुर्की विमानन कंपनियों में से एक सेलबी एविएशन 2008 में भारत में आई, आश्चर्यजनक रूप से, कुछ ही महीनों बाद नवंबर 2008 में मुंबई आतंकवादी हमला हुआ। इस तुर्की कंपनी ने एनएएस इंडिया के साथ साझेदारी की, ताकि संयुक्त उद्यम ‘सेलबी एनएएस एयरपोर्ट सर्विसेज इंडिया प्राइवेट लिमिटेड’ का गठन किया जा सके, जो यूपीए सरकार के दौरान स्थापित हुआ। इस संयुक्त उद्यम ने भारत में संचालन के लिए दस साल का अनुबंध भी प्राप्त किया। तब से, सेलबी दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद, बेंगलुरु, चेन्नई, गोवा, अहमदाबाद और कन्नूर में फैल गई है, जिसमें लगभग 7800 कर्मचारी हैं। लेकिन इसे केवल रोजगार तक सीमित न रखकर, क्षेत्र की निकटता पर विचार करें। सेलबी ने दिल्ली के इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट सहित प्रमुख हवाई अड्डों के तकनीकी कार्गो क्षेत्रों में संचालन किया है। इसकी कार्गो शाखा, सेलबी दिल्ली कार्गो टर्मिनल प्रबंधन इंडिया प्राइवेट लिमिटेड, ने उन स्थानों तक पहुंच बनाई है, जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए रणनीतिक महत्व रखते हैं, जैसे एयर इंडिया वन के हैंगर बे के क्षेत्रों में, जो भारतीय राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री द्वारा उपयोग किया जाता है, साथ ही विभिन्न सैन्य विमानों के हैंगर।

सामान्य परिस्थितियों में यह चिंता या चेतावनी का कारण नहीं होना चाहिए, लेकिन जब राष्ट्रपति एर्दोगान से जुड़ी एक कंपनी—जो स्वयं पाकिस्तान का समर्थन करते हैं— इस प्रकार के अतिमहत्वपूर्ण स्थानों पर कार्य कर रही हो, तो क्या भारत को पुनः विचार नहीं करना चाहिए? आखिरकार, तुर्की न केवल इस्लामाबाद के लिए नैतिक समर्थन प्रदान कर रहा है, बल्कि हर बहुपक्षीय मंच पर उसकी मजबूत वकालत भी कर रहा है। वह चाहे कश्मीर पर झूठी कहानी हो या भारत के आंतरिक मुद्दे रहे हों। वर्षों से तुर्की की पाकिस्तान के लिए रक्षा संबंध, सैन्य प्रशिक्षण, कर्मियों का आदान-प्रदान और संयुक्त सैन्य अभ्यास के माध्यम से कूटनीतिक समर्थन देता रहा है। ऐसे में, जब एक आतंक समर्थक राष्ट्र अपने आप को भारत की विमानन अवसंरचना में समेकित करता है, तो क्या यह उचित नहीं है कि हम इस दोहरी नीति की निंदा करें और उसे रेखांकित करें?

एर्दोगान के नव-ओटोमन आकांक्षाएँ
तुर्की की विश्वसनीयता और आतंक नेटवर्क में भागीदारी, न तो पाकिस्तान से शुरू होती है और न ही खत्म होती है। यह हाल ही के क्षेत्रीय संकटों में पूरी तरह से दिखाई दी—जैसे सीरिया, इराक, या मध्य पूर्व में आईएसआईएस शासन के दौरान तुर्की के आर्थिक लाभ हुआ है। लेकिन यह भागीदारी सीधे नहीं, बल्कि अप्रत्यक्ष और अंतर्निहित भी हो सकती है। पिछले दशक में, तुर्की ने काला बाजार और तस्करी नेटवर्क के माध्यम से जिहादी अभियानों को वित्तीय सहायता प्रदान की, जिनकी रक्षा तुर्कमेन मिलिशिया और स्थानीय छदम कर रहे थे। यहां तक कि अमेरिकी ट्रेजरी ने भी तुर्की की विफलता का ज़िक्र किया कि वह अलकायदा और अन्य इस्लामिक मिलिशिया से जुड़े वित्तीय नेटवर्क को रोकने में असमर्थ रहा। 2015 में, रूसी और पश्चिमी खुफिया सूत्रों की कई रिपोर्टों में एर्दोगान के पुत्र बिलाल एर्दोगान का नाम तेल तस्करी रूट के मुख्य खिलाड़ी के रूप में सामने आया, जो आईएसआईएस नियंत्रित सीरिया से तुर्की में जाता है।

यह वही तुर्की है जिसने अपने सीमाएं जिहादीयों के लिए प्रमुख मार्ग बना दीं—चेचन्या, जर्मनी, लीबिया और पाकिस्तान से—अक्सर तुर्की सीमा अधिकारियों की निगरानी में, आतंकवादियों के रास्ते सहज बनाया। उनके लिए हथियार, सामान आपूर्ति, लड़ाके और पैसा सब बेहिसाब प्रवाहित होता रहा, अभी यूरोप में भी यही हो रहा है। यह स्तर इतना बड़ा था कि जैसे जब्हत अल-नुसरा और हायत तारीर अल-शम जैसे समूह तुर्की की “चेतावनी” के तहत फल-फूल रहे थे। उत्तर सीरिया में “सुरक्षित क्षेत्र” बनाने का एर्दोगान का लक्ष्य केवल मानवीय नीति नहीं था, बल्कि यह उसकी इस्लामवादी मित्रों की रक्षा करने का प्रयास था, जबकि कुर्द समूहों को बाहर निकालते हुए क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत कर रहा था।

अब भारत को क्या करना चाहिए?

अब तक, भारत की प्रतिक्रिया बेहद सतर्क रही है। देश के कई बड़े संस्थानों ने जिनमें JNU अग्रणी है, तुर्की के संस्थानों से अपने समझौते या तो रद्द कर दिए या फिर उन्हें प्रलंबित कर दिया है। जेएनयू ने एक वक्तव्य प्रकाशित करके कहा,
“राष्ट्रीय सुरक्षा के मद्देनजर, JNU और तुर्की के इनुर्णु विश्वविद्यालय के बीच किए गए समझौते को अगली सूचना तक निलंबित किया जाता है।” JNU देश के साथ खड़ा है। सिलेबी कंपनी की मौजूदगी का “पुनर्मूल्यांकन” करने का भी संकेत मिला है, जिसके तहत उसकी सुरक्षा मंजूरी और संचालन का लाइसेंस भी रद्द कर दिया गया है, जो कि सरकार की उचित कदम है। तुर्की विमानन और इंडिगो के बीच यात्रियों की सुविधा के लिए कोड शेयरिंग जारी रहा। इस समझौते के अंतर्गत भारत और इस्तांबुल के वायु क्षेत्र में 30 से अधिक मार्गों को खोला है। वैसे इसकी समाप्ति 31 मई को ही हो गई थी, और कंपनी ने 6 महीने के सेवा विस्तार का आवेदन किया था, लेकिन अब उसे सिर्फ 3 महीने का बिस्तर मिला है, वह भी यात्रियों को असुविधा से बचाने के लिए।

यह सच है कि ये सौदे राजस्व लाते हैं। ये भी सच है कि ये रोजगार सृजित करते हैं। लेकिन देश इसका क्या मूल्य चुका रहा है? क्या कुछ हजार नौकरियाँ रणनीतिक जोखिम उठाने के बराबर हैं? क्या टैक्स राजस्व किसी ऐसी शक्ति को मजबूत करने का आधार हो सकती है जो हमारे दुश्मनों को फंड करती है? क्या आर्थिक तर्क राष्ट्रहित से ऊपर हो सकता है? भारतीय व्यापारियों और नागरिक समाज के बीच “बॉयकॉट तुर्की” अभियान इतनी तेज़ फैला है कि यह सिर्फ प्रतिक्रिया नहीं बल्कि एक तर्कसंगत कदम बन गया है।

हमारे रिसाव वाली लाल रेखाएँ
20 सालों से तुर्की की सत्ता पर काबिज निरंकुश शासक तय्यीप एरडोगन को आधुनिक लोकतंत्र के नेता के रूप में नहीं, बल्कि एक आधुनिक लोकतंत्र के रूप में, बल्कि एक पुनरूत्थानवादी सुल्तान के रूप में जाना जाएगा, जो धर्म, ड्रोन और कूटनीति को अपने निजी लाभ के उपकरण के रूप में इस्तेमाल करता है। पाकिस्तान उसकी कमजोर वफादार की भूमिका में है। वह किसी भी कीमत पर हथियार और कट्टरवादी सोच का समर्थन करने को तब तक तैयार है, जब तक यह उसके “भारत में खून बहाने” के 75 साल पुराने पागलपन को बढ़ावा देता रहेगा। वहीं, भारत का आर्थिक गणनाओं और कूटनीतिक सतर्कता के बीच संतुलन बनाने का संकोच अब पुनर्मूल्यांकन का विषय है, क्योंकि असमर्थता अब अमृत काल में कोई विकल्प नहीं है। भारत के लिए जरूरी है कि वह लक्ष्मण रेखा तय करे और राष्ट्रीय हित की रक्षा में और सभ्यताओं के मूल्यों का सम्मान भी करे। हो सकता है कि एर्दोगान ने पाकिस्तान की गलतियों में सीधे हस्तक्षेप न किया हो, लेकिन उसके लक्षण जरूर दिखाई देते हैं। भारतीय नीति को राष्ट्र सुरक्षा और नैतिक विदेशी नीति के बीच संतुलित बनाना करना चाहिए। कोई भी, चाहे पाकिस्तान हो या तुर्की, किसी भी भारत-विरोधी एजेंडे को अंजाम देने का मौका नहीं मिलना चाहिए। हमें तुर्की को अहसास कराना होगा कि, भारतीय हितों को नुकसान पहुंचाने की कीमत क्या होगी?

मैं कोई अजर-अमर हूँ थोड़े…!
सीधी-सादी थी…
गवाही चाहिए……!
17 सांसदों को मिलेगा संसद रत्न पुरस्कार 2025: योगदान और समर्पण का सम्मान
पाकिस्तान की सेना, मौलवी और आतंकवादी तीनों षड्यंत्रकारी 
Share This Article
Facebook Email Print
Previous Article अखिल भारतीय अग्निशिखा मंच का ऑनलाइन कवि सम्मेलन संपन्न अखिल भारतीय अग्निशिखा मंच का ऑनलाइन कवि सम्मेलन संपन्न
Next Article बीएमसी स्कूलों में धूमधाम से मनाया गया प्रवेशोत्सव, बच्चों को बांटी गई शैक्षणिक सामग्री बीएमसी स्कूलों में धूमधाम से मनाया गया प्रवेशोत्सव, बच्चों को बांटी गई शैक्षणिक सामग्री
Leave a Comment

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

about us

Akhand Rashtra एक राष्ट्रीय दैनिक अख़बार है, जो 18 वर्षों से निष्पक्ष, सटीक और जिम्मेदार पत्रकारिता करते हुए प्रिंट व डिजिटल माध्यमों पर सक्रिय है।

  • उत्तर प्रदेश
  • मध्य प्रदेश
  • उत्तराखंड
  • गुजरात
  • पश्चिम बंगाल
  • बिहार
  • महाराष्ट्र
  • देश
  • विदेश
  • एक्सक्लूसिव
  • अपराध
  • राजनीति
  • साहित्य
  • About Us
  • Privacy Policy
  • Terms & Conditions – Akhand Rashtra
  • Disclaimer
  • GDPR
  • Contact

Find Us on Socials

© 2008 - 2026 Akhand Rashtra News All Rights Reserved. Proudly Made By Akshant Media Solution
Join Us!
Subscribe to our newsletter and never miss our latest news, podcasts etc..
[mc4wp_form]
Zero spam, Unsubscribe at any time.
Welcome Back!

Sign in to your account

Username or Email Address
Password

Lost your password?

Not a member? Sign Up