हिन्दी साहित्य में प्रेमचन्द सबसे ज्यादा लोकप्रिय और पढ़े जाने वाले साहित्यकार हैं, जिनके साहित्य के विषय में देश के विभिन्न विद्वान आलोचकों ने अपने-अपने तरीके से बात की है। प्रेमचन्द ने अपने जीवनकाल में हिन्दी साहित्य की लगभग सभी विधाओं में लिखा है। प्रेमचन्द ने जो लिखा उनके जीवनकाल में ही लगभग सब प्रकाशित भी हुआ। कुछ कृति जैसे मंगलसूत्र आदि उनके निधन के बाद उनके पुत्र श्रीपतराय व अमृतराय द्वारा खोज-खोजकर प्रकाशित किया गया। प्रेमचन्द द्वारा स्थापित सरस्वती प्रेस उनके पुत्रों को विरासत में मिला जहां से उनकी अधिकतर किताबें छपीं। जब दोनों बेटे अलग हुए तो श्रीपतराय के हिस्से में सरस्वती प्रेस आया और अमृतराय ने ‘हंस’ प्रकाशन की नींवर रखी जिसके द्वारा उन्होंने प्रेमचन्द की लुप्तप्राय सामग्री को ढूंढकर हिन्दी साहित्य को दी। इसके अतिरिक्त दुनिया भर के शोधार्थी और आलोचकों ने प्रेमचन्द के साहित्य को ढूंढकर साहित्य जगत में जोड़ने का कार्य किया। हालांकि यह सिलसिला आज भी जारी है। प्रेमचन्द के समय कहानी, उपन्यास और लेख तमाम लेखक लिख रहे थे, किन्तु प्रेमचन्द अपनी लेखनी से सबसे शीर्ष पर चले गए। इसका सबसे बड़ा कारण यह रहा कि उनकी भाषा आम आदमी की भाषा है। हिन्दी, उर्दू और अंग्रेेजी भाषाओं पर मानो उनका कब्जा हो। प्रेमचन्द का साहित्य गांधीवादी विचारधारा से शुरू होकर यथार्थवाद और फिर समाजवाद की तरफ झुका। प्रेमचन्द जैसे गांधी जी के विचारों से कायल थे उसी प्रकार गांधी जी भी प्रेमचन्द से बहुत प्रभावित थे।
31 जुलाई 1880 को वाराणसी जनपद के लमही ग्राम में जन्मे हिन्दी साहित्य के महामानव, कलम के सच्चे सिपाही प्रेमचंद ने अपने केवल 56 वर्षों के जीवनकाल में अपार संघर्षों का वरण करते हुए साहित्य को जनचेतना का सशक्त माध्यम बना दिया। मात्र सात वर्ष की आयु में मातृछाया छिन गई और कुछ ही वर्षों में पितृस्नेह भी जीवन से विलग हो गया। बाल्यावस्था में ही विवाह और पारिवारिक दायित्वों ने जीवन को नई चुनौतियों से भर दिया। आर्थिक दबावों ने उन्हें दसवीं उत्तीर्ण करते ही नौकरी हेतु विवश कर दिया। उनके आरंभिक लेखन को लेकर मतभेद अवश्य हैं, किंतु यह तथ्य निर्विवाद है कि 1901 में धनपत राय नाम से उनका पहला उर्दू उपन्यास ‘हमखुर्मा ओ हमसवाब’ प्रकाशित हुआ। इसके चार वर्ष बाद ‘जमाना’ पत्रिका में उन्हीं के नाम से एक आलोचनात्मक लेख भी छपा। 1907 में ‘जमाना’ में ही उनकी प्रथम कहानी ‘संसार का सबसे अनमोल रत्न’ प्रकाशित हुई। 1908 में ‘सोजे-वतन’ नामक उनका उर्दू कहानी-संग्रह ‘नवाब राय’ नाम से छपा, जिसे ब्रिटिश सत्ता ने राष्ट्रवादी तेवरों के कारण प्रतिबंधित कर दिया। इसी काल में, जब वे हमीरपुर के महोबा में डिप्टी इंस्पेक्टर थे, उन्होंने प्रेमचंद उपनाम से लिखना आरम्भ कर दिया। इस नाम से उनकी पहली कहानी ममता प्रकाशित हुई।
लगभग छह वर्षों बाद जब उनका स्थानांतरण बस्ती जिले में हुआ, वहीं उन्होंने अपनी कालजयी कहानी पंच परमेश्वर की रचना की। 1929 में उन्होंने माधुरी का संपादन आरंभ किया और हंस पत्रिका से जुड़ गए। उनका साहित्यिक जीवन तब एक नया मोड़ लेता है जब वे बम्बई की एक फिल्म कंपनी के आमंत्रण पर गए, किन्तु एक वर्ष बाद ही वे पुनः अपने गाँव लमही लौट आए। 1936 उनके जीवन का निर्णायक वर्ष सिद्ध हुआ। इसी वर्ष उनकी यशस्वी कृति गोदान प्रकाशित हुई, जो ढहते सामंतवाद और उभरते पूँजीवाद के संधिस्थल पर मनुष्य की जिजीविषा, संघर्षशीलता और सामाजिक विषमताओं का यथार्थ दस्तावेज बनकर सामने आई। हंस पत्रिका पर अंग्रेजी शासन द्वारा जुर्माना और जमानत लगाई गई, लेकिन उनकी लेखनी थमी नहीं। उन्होंने अपने अंतिम उपन्यास मंगलसूत्र का लेखन कार्य आरंभ किया। हंस का पुनः प्रकाशन दिल्ली से आरंभ हुआ, पर इसी वर्ष 1936 में जनसांस्कृतिक चेतना के पुजारी, यथार्थवादी साहित्य के पुरोधा प्रेमचंद इस संसार से विदा हो गए।
प्रेमचंद का समग्र साहित्य आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना वह अपने समय में था। उनका रचना-संसार मात्र साहित्यिक विमर्श नहीं, बल्कि सामाजिक यथार्थ का जीवन्त दस्तावेज है, जो अपने समय की धड़कनों को पकड़ता है और आने वाले समय को दिशा भी देता है। इसका एक कारण यह भी है कि उनका जन्म गाँव में हुआ था, इसलिए गाँव की जिंदगी उनके दिल-दिमाग में रची-बसी थी। उन्होंने किसानों, मजदूरों और गरीबों के दुःख-दर्द को महसूस किया और उसे अपनी कहानियों के जरिए सबके सामने रखा। समाज में फैली कई बुराइयों जैसे अशिक्षा, बाल विवाह, छुआछूत, वेश्यावृत्ति और अंधविश्वास के खिलाफ आवाज उठाई। उन्होंने इन समस्याओं को उजागर करते हुए इसके समाधान की ओर भी इशारा किया है। अपने रचना संसार में उन्होंने विशेष रूप से निन्म मध्य वर्ग की समस्याओं को उठाया। बाहरी आडम्बर से कोसों दूर रहे प्रेमचन्द ने शहरी वातावरण का भी सजीव अंकन किया। प्रतिकूल परिस्थितियों में भी उन्होंने कभी जनवादी लेखन से समझौता नहीं किया। वह मानवतावाद के प्रबल समर्थक थे। हिन्दी से अनुवाद का चलन प्रेमचन्द की कृतियों से ही आरम्भ हुआ। प्रेमचंद ने अपने जीवन में हजारों पत्र लिखे, लेकिन दुर्भाग्यवश उनमें से अधिकतर समय की धूल में खो गए। जो पत्र आज हमारे पास उपलब्ध हैं, उनमें उनके विचारों की गहराई, देश के प्रति उनका प्रेम, उनकी उम्मीदें और उनके साहित्यिक आदर्श साफ झलकते हैं। इन पत्रों में एक संवेदनशील और जागरूक लेखक की आत्मा बोलती है। प्रेमचंद का व्यक्तित्व साहित्य से आगे बढ़कर एक सामाजिक चेतना का प्रतीक बन गया था। उनकी लेखनी में संघर्ष की भावना और परिवर्तन की चाह हमेशा जीवित रही। आज भी प्रेमचंद का जीवन और साहित्य हमें संघर्ष करने, सच के लिए खड़े होने और समाज को बेहतर बनाने की प्रेरणा देता है।

