आओ मित्रों तुम्हें सुनाएं…!
जग वालों की इंसानी दास्तान…
नहीं अघाते लोग यहाँ,
करते-करते खुद का ही बखान…
मौका मिलते ही प्यारे,
हर मंच पर देते रहते हैं ये बयान….
नहीं धरा पर उनसे अच्छा,
जिसका तुम कर पाओगे गुणगान…
गौर से देखो प्यारे….इस युग में…
गजब दौर में…जी रहा है इंसान….
सब की अलग-अलग है जन्नत,
सबके अलग-अलग हैं भगवान….
कारण इसके पीछे बस एक है मित्रों
सब ही चाहे….इस जग में….
सबसे अलग हो उसकी पहचान…
हर हाल में उसका उल्लू सीधा होवे,
भाड़ में जाए जग के सारे अहसान..
बस इसी कामना में प्यारे….!
लगाए पड़ा है वह जी-जान….
धन-वैभव,यश-कीरत पर,
हर-पल,हर-दम रहता उसका ध्यान
यही नहीं बस इस पर ही….!
रहता उसको बड़ा गुमान….
और तो और देखो तो प्यारे….
तय कर रखा है सबने….!
किसको कितना देना है सम्मान….
एक फलसफा और है सीखा,
नहीं भूलना है कभी भी….!
कहीं हुआ हो जो अपमान…..
क्षमा माँगने की आदत भी,
भूले बैठा है हर इंसान….
भले जानते सभी यहाँ पर,
खतरनाक बहुत होता है….!
आधा और अधकचरा ज्ञान….
हर इक इंसान….यहाँ लिए बैठा है…
अपना-अपना अभिमान….
खुद गढ़ता परिभाषा सारी…
और…मानक करता तैयार….
इस मानक पर ही वह तय करता है..
कौन गिरा हुआ है कितना…और…
कौन है कितना यहाँ महान….?
मानो या न मानो मित्रों….!
कड़वी लग सकती हैं…ये सब बात…
पर…यही है अब के इंसानी जज़्बात
संग इसी के कहता मैं….!
एक सीधी और सच्ची बात….
लोकतंत्र की अनंत है माया,
जहाँ…सब इंसान हैं एक समान…
झूठ-साँच की लिए पोटली
भले घूम रहे हों सब सीना तान….
तनिक देर नहीं लगती है प्यारे,
गिरने में….इंसानी झूठी शान….
मिट जाती हैं परिभाषाएँ सारी,
कितना हू हो इनका ज्ञान….
चढ़े कभी ना लाली…इनके होठों पर
कितनो ही घुलायें ये मुँह में पान….
ध्रुव सत्य यही है प्यारे…फिर भी…
देखो तो…कितना भ्रम में….?
जी रहा है अब का इंसान….
देखो तो….कितना भ्रम में….?
जी रहा है अब का इंसान… .
रचनाकार…..
जितेन्द्र कुमार दुबे
अपर पुलिस उपायुक्त,लखनऊ

