नाम खानदान के बढ़ावे बरे….!
खींचतान के बाप जान,
बहुतइ दिहिन हमें पढ़ाय….
ई पढ़ै-लिखे के चक्कर मा,
हम धीमे से गएन बुढाय….
बेरोजगारी के प्रबल दौर मा,
कुलि मेहनत के बाद हू….!
नौकरियां हमें मिली न भाय….
और-त-और खेती-बारिन मा,
घर वालेन…ज़बरन हमसे…
बहुतइ मेनहत दिहिन कराय…
गोर-गार सब चमड़ी मोरी,
बहुतइ गई करियाय….
एतनौ तक तो सब चलत रहा,
पर काउ कही हम तोहसे भाय….
अब तो बियाह बरे हमरे….!
दरवाजे पर कोउनो औउतय नाय…
कौनो तरह जब बहुत दिनन में,
एक रिश्ता कैसउ आय…
संजोग ई देखा….हमहूँ….!
उन लोगन के पसंद हो गए भाय…
मन फुलौरी होय गवा,
कछु भी बोलल ना जाय…
अब पीर सब दूर भई,
रोम-रोम हरषे औ मुसकाय….
सुखद कल्पना और मधुरिम आशा में
हम सबसे मिलत-लजियात…
सब कुछ सही ही जात रहा…पर…
भैया एक दिन पंडित जी गएन आय,
धीरे से बोल गए बापू से…
कुछ अइसन बाटै भाय…
नाड़ी दोष त बटबै कींन,
गुण ग्यरहै भर मिलत बाय….
आउर सब त एक तरफ
कुंडली तनिको मिलत नहीं बा भाय..
एतना सुनि कै बापू बोले…
फिर गुरुवर ई रिश्ता तो तुरतै…!
लौटाय भर दीन जाय…और….
मोबाइल के जरिए बापू,
झट दीन ई रिश्ता टरकाय….
सुन बापू के ऐसी वानी….!
अखियाँ मोरी भरि-भरि आयी भाय..
यह सोच-सोच हम मरन लगे कि,
ई पगली लगन में भी….!
लागत बा कुँआरै हम रहि जाब…
न जाने कौन जनम के,
करम फलत है….
जो सब मिलि-मिलि कै,
एक अदद मेहरारू कै खातिर
हमै देत हैं तरसाय….
अब कैसे बताईं हम केहू के…!
सब दुखवा एक तरफ हौ भैया,
ई दुखवा केहू से कहलो न जाय…
ई दुखवा केहू से कहलो न जाय…
रचनाकार….
जितेन्द्र कुमार दुबे
अपर पुलिस उपायुक्त, लखनऊ

