कानून और समाज का रिश्ता सदियों पुराना है, किंतु जब यह रिश्ता जानकारी के अभाव में सिमट जाता है, तो न्याय केवल एक विचार बनकर रह जाता है। जौनपुर जैसे ऐतिहासिक जनपद में, जहां तहज़ीब और शिक्षा की गहराई है, वहां यह और अधिक जरूरी हो जाता है कि नागरिक विधिक चेतना से संपन्न हों।
आज भी जनपद के अधिकांश नागरिक थाने और अदालत के नाम से घबराते हैं। उन्हें लगता है कि कानून का रास्ता केवल विवाद और झंझट का रास्ता है। इस मानसिकता को बदलने की आवश्यकता है। दरअसल, कानून किसी भी नागरिक के जीवन का अभिन्न हिस्सा है, और उसका ज्ञान होना उतना ही आवश्यक है जितना किसी पते का मालूम होना।
हमारे आस-पास की घटनाएं—भूमि विवाद, घरेलू हिंसा, फर्जी दस्तावेज़, साइबर ठगी, सरकारी योजनाओं में भेदभाव—यह सब केवल इसलिए घटित होते हैं क्योंकि पीड़ित अपने अधिकारों से अनभिज्ञ होता है। उदाहरणस्वरूप, यदि कोई नागरिक यह नहीं जानता कि उसे पुलिस में सीधी एफआईआर दर्ज करवाने का अधिकार है, तो वह ‘समझौते’ के नाम पर अन्याय सहने को विवश हो जाता है।
आज के समय में जब सूचना तकनीक हमारी जेब में है, तब विधिक जानकारी का अभाव केवल जागरूकता की कमी का प्रतीक है। ‘सूचना का अधिकार अधिनियम’ जैसे प्रावधान आमजन के लिए ऐसे उपकरण हैं जिनसे वे न सिर्फ सरकारी कार्यप्रणाली पर निगरानी रख सकते हैं, बल्कि अपने सवालों का उत्तर भी मांग सकते हैं।
एक शिक्षित समाज की पहचान यह नहीं कि वह केवल डिग्रियाँ रखता हो, बल्कि यह है कि वह अपने अधिकारों और कर्तव्यों को लेकर सजग हो। जौनपुर के नागरिकों में यह सजगता बढ़े, इसके लिए विधिक साक्षरता अभियान, पंचायत स्तर पर जागरूकता शिविर और विद्यालयों में मूलभूत कानूनी शिक्षा की आवश्यकता है।
यह भी समय की मांग है कि हम अपने घरों में बच्चों को संविधान के अनुच्छेदों की जानकारी दें, महिलाओं को उनके वैवाहिक एवं संपत्ति संबंधी अधिकार समझाएं और वरिष्ठ नागरिकों को उनके संरक्षण कानूनों से परिचित कराएं।
कानून डराने के लिए नहीं, सशक्त बनाने के लिए है। यह उस दीपक के समान है, जो अंधकार से घिरे समाज को दिशा देता है। लेकिन दीपक तभी जलता है जब बाती को ज्ञान का तेल मिलता है।
इसलिए आवश्यक है कि हम अपने कस्बों, गांवों और शहरों में विधिक चेतना का दीप जलाएं। जब नागरिक अपने अधिकार जानेंगे, तभी समाज में वास्तविक न्याय स्थापित होगा।

