कृष्ण कुमार नोनिया (अखंड राष्ट्र)
कतरास (धनबाद) कभी लोगों के पिकनिक और वन्य जीवन का अद्भुत संगम माने जाने वाला जोगता हरित उद्यान आज केवल अतीत की यादों में ही सिमट कर रह गया है। बीसीसीएल के मोदीडीह कोलियरी के अंतर्गत आने वाला यह हरित उद्यान अब कोयला खनन के विस्तार की बलि चढ़ चुका है।
विश्व पर्यावरण दिवस पर जब लोग हरियाली और वन संरक्षण की बातें कर रहे हैं, तब जोगता हरित उद्यान का इतिहास करुण गाथा के रूप में सामने आता है। कभी हिरणों की कुलांचे, तालाब का ठंडा पानी और गुलाबों की महक से गुलजार रहने वाला यह पार्क अब खुले खदान और ओबी (ओवरबर्डन) के पहाड़ों में तब्दील हो गया है।
*आग से हरियाली तक की कहानी*
कहानी की शुरुआत तब हुई जब जोगता फायर प्रोजेक्ट एरिया के तत्कालीन परियोजना पदाधिकारी केके मल्होत्रा ने इस हरित उद्यान की नींव रखी। आग से झुलसे इलाके पर करोड़ों खर्च कर मिट्टी डालकर आग को काबू में किया गया और जमीन को समतल कर हरियाली का सपना बुना गया।
*वन्य जीवन और मनोरंजन का केंद्र*
समतल भूमि पर हजारों पौधे लगाकर न सिर्फ पार्क बनाया गया बल्कि हिरण उद्यान और गुलाब उद्यान भी विकसित किया गया। तालाब भी खुदवाया गया जहां मत्स्य पालन होता था। हिरण, खरगोश, सांप, बंदर और अन्य जीव-जंतु यहां पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र थे। जनवरी के महीनों में यहां पिकनिक मनाने वालों का तांता लगा रहता था।
*2007-08 के बाद सब कुछ खत्म*
वर्ष 2007-08 के आते-आते कोयला खनन की गतिविधियां बढ़ गईं और पेड़ों की कटाई शुरू हो गई। वन्य जीवों का उचित रखरखाव भी प्रभावित हुआ और धीरे-धीरे उद्यान वीरान होता गया। अंतत: आउटसोर्सिंग कंपनियों के हाथों कोयला खनन की जिम्मेवारी सौंप दी गई और हरित उद्यान का नामोनिशान मिट गया।
*वर्तमान में सिर्फ खदान और ओबी का पहाड़*
आज वहां सिर्फ खुली खदान और ओबी का पहाड़ नजर आता है। विकास की दौड़ में पेड़-पौधे कट गए और उद्यान का अस्तित्व खत्म हो गया। सबसे बड़ी विडंबना यह रही कि किसी ने यहां फिर से पौधारोपण या उद्यान विकसित करने की जरूरत नहीं समझी।
जोगता हरित उद्यान की यह कहानी हमें बताती है कि विकास की दौड़ में हरियाली और वन्य जीवन किस तरह कुर्बान हो जाता है। विश्व पर्यावरण दिवस पर यह सवाल हम सभी के सामने है: क्या विकास की दौड़ में हम हरियाली और वन्य जीवन को हमेशा के लिए खो देंगे?

