गाँव में अपने पहली बार…..!
जब पड़ोसी से माँगा मैंने,
कुछ घंटों के लिए साइकिल उधार..
नाक-नयन सब मोड़-सिकोड़,
किये उसने नखरे हजार….और…
झट से किया साफ इनकार….
और तो और….फुला के सीना…
यह भी बोला…हाथी से ही तो…!
शोभित होता है घर-द्वार….
कैसे तुमको दे दूँ बोलो…?
मैं अपने घर की हाथी उधार…
मैने फिर से करी मनुहार…और…
कहा ज़रूरत आन पड़ी है सरकार…
बात मेरी ना खाली जाने पाए….!
सो..लेकर अधरों पर कुटिल मुस्कान
दी उधार….साइकिल एक खटार….
घंटी छोड़ बज रहा सभी कुछ था,
ब्रेक दिख रहा था उसका बीमार…
मज़बूरी थी मेरी भी प्यारे…!
सो…किया इसे भी मैंने स्वीकार…
फिर चलते-चलते …तनके यह बोला
उधार में….हाथी माँगने का …
अब तुम…मत कभी पहनना चोला..
सुनकर उसकी यह फुफकार….!
तन-मन-हृदय अन्दर से डोला…पर..
मानो या न मानो मित्रों….!
हर पड़ोसी की लगभग,
होती है यही बानगी….
दिखावे भर की होती है,
उनकी करीबी और सादगी…
इसीलिए ही अक्सर…कहते हैं लोग..
पड़ोसी रहता तभी सुखी….!
पड़ोसी उसका जब रहे दुखी…
गौर से देखो तो मित्रों….
इस जमाने में….पड़ोसिन्ह को…
लाज-शरम तनिक नहीं है भाई
झूठी लगती है हरदम इनको,..!
तुलसी की यह चौपाई….कि…
परहित सरिस धरम नहिं भाई,
परपीड़ा सम नहिं अधमाई…
सच कहूँ तो मित्रों…..!
झूठी लगती है हरदम इनको,
रहिमन की कविताई….
जिनकी इक छोटी सी रचना में
दिखती है जीवन की सच्चाई…कि…
रहिमन वे नर मर चुके,
जो कछु माँगन जांय…
उनते पहिले वे मुए,
जिन मुख निकसत नाहि…
संग इसी के मित्रों….!
गौरतलब है एक गूढ़ विचार….
गाँव-देश में सबको ही….
रहती ही है पड़ोसी की दरकार….
चैन कहाँ है किसी को आता,
जब तक आये दिन…सुन ना लें….
एक दूजे की ललकार….
इसके अलावा सच यह भी है प्यारे
लाख बुरा हो कोई पड़ोसी…पर…
गाँव-देश में देखा है हम सब ने…
भले दिखावटी ही हो प्यारे…पर…
मिलता रहता है इनका प्यार….
भले कराएँगे अपनी कुछ मनुहार…!
पर…गाढ़े समय पर मित्रों…
संग खड़े मिलेंगे तैयार…
रचनाकार….
जितेन्द्र कुमार दुबे
अपर पुलिस उपायुक्त, लखनऊ

