पहाड़…..!
दुनिया की नजरों में,
आसमान छूने को…
लालायित दिखता है….
पर…उसके अन्तर्मन से पूछो…
शायद….नहीं भाता है उसको…
तन के खड़े रहना…
चाहता है वह भी….!
मैदान की तरह समतल हो जाना…
नहीं चाहता है वह,
जड़ों से इस कदर जुड़ना…..!
कि किसी दिन अहंकार में आकर,
कोई रख दे…उसके हृदय तल पर…
अपने गुरूर का पगतल….
उसे पता है….अहसास है कि….!
सभ्यताएं मैदानों में पलती हैं…
देना चाहता है वह भी,
सभ्यताओं के निर्माण में….!
अपना भरपूर योगदान….
कभी नींव की ईट होकर…या फिर…
कभी नदी की माटी-रेत बनकर….
इसीलिए गर्मियों में पहाड़….!
खुद का शरीर चीर देता है,
खुद को खोखला कर देता है,
बहाता है अपना पसीना….!
नदी की धार के रूप में….
बसाने को समतल मैदान…और…
पाने को मनुष्य का सानिध्य…
इतना ही नहीं…इंतजार करता है वह
सावन-भादों के बरसने का भी….
खुद को हरा-भरा रखने को नहीं,
बल्कि बहा ले जाने को….!
उन्हें पूरा का पूरा….
एक सुंदर समतल मैदान के,
सृजन के लिए….
उलट इसके प्यारे….!
यहाँ संसार में देखो तो….
मनुष्य तना-तना सा रहता है,
कुछ पहाड़ सा बना रहता है….
सृजन….यद्यपि उसके जेहन में है…
पर मन-मस्तिष्क पर इसके….!
बस स्वारथ ही चढ़ा रहता है…और…
दूर…बहुत दूर ही रहता है वह….
परमारथ की भावना से…
भूल बैठा है वह अपना जमीर
भूल बैठा है वह…तुलसी और कबीर
भाता नहीं उसको कभी भी….
बृक्ष कबहुँ न फल भखै,
नदी न संचय नीर….
परमारथ के कारने,
साधुन धरा शरीर….
बना रहता है हमेशा ही….
वह…लक़ीर का फकीर…
और….आत्ममुग्ध होकर…
बाँचता रहता है….
ख़ुद ही ख़ुद की तक़दीर…..
रचनाकार….
जितेन्द्र कुमार दुबे
अपर पुलिस उपायुक्त,लखनऊ

