मुंबई से आ रहे एयर इंडिया के विमान के लैंड होते ही दिल्ली पुलिस ने प्लेन के अंदर पहुंचकर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के तीनों टॉप लीडर्स — अभिजीत दीपके, सौरव दास और आशुतोष रंका — को हिरासत में ले लिया। वे जंतर मंतर पर प्रस्तावित प्रदर्शन की अगुवाई करने दिल्ली आए थे। लेकिन एयरपोर्ट से बाहर निकलने का मौका तक नहीं मिला।
ये घटना तब हुई जब शहर पहले से ही भारी सुरक्षा घेरे में था। मेट्रो स्टेशन बंद, ट्रेनें रद्द, बैरिकेडिंग और सैकड़ों लोगों की हिरासत। ऐसे में लीडर्स को प्लेन से ही रोक लिया जाना कई सवाल खड़े कर रहा है।
प्लेन के अंदर क्या हुआ?
वीडियो और रिपोर्ट्स के अनुसार, विमान लैंड होते ही पुलिसकर्मी अंदर गए। अभिजीत दीपके से कहा गया कि प्रदर्शन की अनुमति नहीं है। दीपके का जवाब था — “मैं अरेस्ट होने ही आया हूं। अरेस्ट कर लो।” उन्होंने पूछा कि पुलिस को प्लेन के अंदर आने का क्या अधिकार है और कहा कि ये बात बाहर जाकर भी बताई जा सकती थी।
सीजेपी ने इस कार्रवाई को “पूर्व नियोजित” बताया। पार्टी का कहना है कि लीडर्स को प्रदर्शन स्थल तक पहुंचने से पहले ही रोकने की योजना थी ताकि आंदोलन की अगुवाई कमजोर पड़ जाए। सीजेपी ने तीनों लीडर्स की तुरंत और बिना शर्त रिहाई की मांग की है।
सिर्फ तीन नेता नहीं, पूरी रणनीति
ये हिरासत अकेली घटना नहीं है। इससे पहले ध्रुव राठी को गुरुग्राम के घर से उठाया जा चुका था। सैकड़ों युवा और कार्यकर्ताओं को दिल्ली के अलग-अलग इलाकों से हिरासत में लिया गया। कई रिपोर्ट्स में 500 से 1000 तक के आंकड़े आए हैं।
जब कोई आंदोलन सिर्फ सवाल पूछने और जंतर मंतर (जो सुप्रीम कोर्ट द्वारा मान्य प्रदर्शन स्थल है) पहुंचने की कोशिश करता है, और उसके लीडर्स को प्लेन से ही रोक दिया जाता है, तो तस्वीर साफ हो जाती है। सिस्टम को लगता है कि युवाओं की आवाज़ अब सिर्फ सोशल मीडिया तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।
सीजेपी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रही है। आरोप है कि स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के नाम पर वोटर लिस्ट में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी हुई है। जुलाई में इसी संगठन के आंदोलन ने शिक्षा मंत्री के इस्तीफे तक का नतीजा निकाला था। अब जब चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठे हैं, तो प्रतिक्रिया और तेज हो गई है।
अनुमति का तर्क और असली मुद्दा
पुलिस बार-बार कह रही है कि प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी गई थी। लेकिन सवाल ये है कि क्या अनुमति न होने का मतलब ये है कि लोग घर से या प्लेन से भी उठाए जा सकते हैं? क्या लीडर्स को प्रदर्शन स्थल तक पहुंचने से पहले ही रोक देना लोकतंत्र की प्रक्रिया का हिस्सा है?
अभिजीत दीपके ने उड़ान से पहले ही कह दिया था कि उन्हें अरेस्ट हो सकता है। उन्होंने साफ कहा था कि वे डरने वाले नहीं हैं। NSA या UAPA का जिक्र भी किया था। फिर भी पुलिस ने प्लेन के अंदर जाकर कार्रवाई की। ये तरीका कई लोगों को असहज कर रहा है।
युवाओं की आवाज़ और व्यवस्था का जवाब
आज की घटनाओं से एक बात साफ हो गई है। जब युवा संगठित होकर कोई मुद्दा उठाते हैं — चाहे वो शिक्षा हो या चुनावी प्रक्रिया — तो सिस्टम की प्रतिक्रिया बहुत तेज होती है। मेट्रो बंद करना, ट्रेनें रद्द करना, इंटरनेट पर पाबंदी लगाना और फिर लीडर्स को प्लेन से ही रोक देना — ये सब मिलकर एक बड़ा संदेश देते हैं।
सीजेपी का कहना है कि ये सब युवाओं से डर की वजह से हो रहा है। जब लीडर्स को प्रदर्शन स्थल तक पहुंचने का मौका ही न दिया जाए, तो सवाल उठता है कि विरोध का अधिकार असल में कितना बचा है।
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आखिरी सवाल
प्लेन से लीडर्स को उठाना सिर्फ सुरक्षा का मामला नहीं रह जाता। ये दर्शाता है कि व्यवस्था इस बार किसी भी कीमत पर युवाओं की संगठित आवाज़ को जंतर मंतर तक नहीं पहुंचने देना चाहती।
जब कोई व्यक्ति सिर्फ इसलिए हिरासत में लिया जाए कि वह चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाने वाले प्रदर्शन की अगुवाई करने आया था, तो ये घटना सिर्फ तीन नेताओं की हिरासत नहीं रह जाती। ये बड़े सवाल का हिस्सा बन जाती है — लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार आज कितना सुरक्षित है?

