- ओमकार त्रिपाठी (अखंड राष्ट्र)
जौनपुर | जौनपुर जो अपनी स्वादिष्ट इमरती और ऐतिहासिक विरासत के लिए जाना जाता है, आजकल नशे की भयावह लहर में डूबता नजर आ रहा है। यहां के कुल 29 थाना क्षेत्रों में से 27 थानों में गांजे का अवैध कारोबार खुलेआम चल रहा है। स्थानीय लोगों और सूत्रों का आरोप है कि यह धंधा पुलिस की नाक के नीचे नहीं, बल्कि उनकी जानकारी और कथित ‘मौन समर्थन’ से फल-फूल रहा है। सरकारी भांग की दुकानें कानूनी हैं, लेकिन असली खेल गलियों, पान की दुकानों और सुनसान नुक्कड़ों पर हो रहा है, जहां छोटे-छोटे पैकेट में गांजा युवाओं तक आसानी से पहुंच रहा है।
जिले में गांजे की तस्करी और बिक्री अब एक संगठित व्यवसाय बन चुकी है। स्थानीय अपराधी इसे ‘पुड़िया’ के रूप में बेचते हैं, जिसकी कीमत 50 से 200 रुपये तक होती है। ग्रामीण इलाकों से लेकर शहर की तंग गलियों तक, यह जहर हर उम्र के युवा तक पहुंच गया है। स्कूल-कॉलेज के छात्र भी इसकी चपेट में आ रहे हैं। कई परिवारों ने शिकायत की है कि उनके बच्चे पढ़ाई छोड़कर नशे की लत में पड़ गए हैं, लेकिन पुलिस कार्रवाई नाममात्र की ही होती है।
कानूनी दुकानें सिर्फ दिखावा, असली खेल अवैध
नियमों के अनुसार, भांग की बिक्री केवल लाइसेंस प्राप्त सरकारी दुकानों तक सीमित होनी चाहिए। लेकिन जौनपुर में हकीकत कुछ और है। अवैध नेटवर्क ने इसे एक बड़ा बाजार बना दिया है। अपराधी गांजे को छोटे पैकेट में बांटकर बेचते हैं, जिससे युवा आसानी से इसे खरीद लेते हैं। सूत्रों के मुताबिक, ज्यादातर थाना अध्यक्ष और स्थानीय पुलिस इस कारोबार से अच्छी तरह वाकिफ हैं। चर्चा है कि हर पुड़िया की बिक्री में ‘ऊपर’ तक हिस्सा पहुंचता है, इसलिए रेड के बजाय पुलिस आंखें मूंद लेती है।
जिले के 29 थानों में से सिर्फ दो थाने ऐसे हैं जहां पुलिस की सख्ती बरकरार मानी जाती है। बाकी 27 थानों में अपराधी खुले आम धंधा कर रहे हैं। ग्राउंड रिपोर्ट्स बताती हैं कि मिर्जापुर-वाराणसी बॉर्डर से लेकर जौनपुर शहर तक, गांजा ट्रकों, बाइकों और यहां तक कि साइकिलों पर लाकर बेचा जा रहा है। हाल ही में खुटहन थाने में पुलिस ने 1.32 क्विंटल गांजा बरामद कर दो तस्करों को गिरफ्तार किया था, जिसकी कीमत 35 लाख रुपये बताई गई। लेकिन यह कार्रवाई अपवाद है, नियम नहीं। ज्यादातर मामलों में पुलिस चुप्पी साधे रहती है।
पुलिस का ‘डबल गेम’: स्वार्थ या मिलीभगत?
पुलिस का मुख्य दायित्व अपराध रोकना है, लेकिन जौनपुर में स्थिति उलट लग रही है। कई बार पुलिस छोटे-मोटे अपराधियों को मुखबिर (इनफॉर्मर) बनाकर इस्तेमाल करती है। बदले में उन्हें गांजा बेचने की ‘छूट’ मिल जाती है। इससे अपराधियों का हौसला बढ़ता है और नशे का जाल फैलता जाता है। स्थानीय लोग कहते हैं कि पुलिस का यह स्वार्थ युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ कर रहा है।
एक स्थानीय युवक ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “हमारे मोहल्ले में पान की दुकान पर ही गांजा मिल जाता है। पुलिस वाले रोज आते-जाते हैं, लेकिन कुछ नहीं करते। लगता है सबको पता है, लेकिन कोई बोलता नहीं।” कई परिवारों ने बताया कि उनके बच्चे नशे की लत में पड़कर पढ़ाई छोड़ चुके हैं और घर-परिवार बर्बाद हो रहा है।
युवा पीढ़ी खतरे में, जौनपुर ‘उड़ता जौनपुर’ बनने की कगार पर
जौनपुर में नशे की समस्या अब महज एक अपराध नहीं, बल्कि सामाजिक संकट बन चुकी है। स्कूल-कॉलेज के आसपास गांजे की उपलब्धता बढ़ने से छात्रों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है। कई जगहों पर युवा अपराध की ओर मुड़ रहे हैं, क्योंकि नशा उन्हें कमजोर कर रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर समय रहते कार्रवाई नहीं हुई, तो जौनपुर पंजाब की तरह नशे की दलदल में फंस सकता है।
प्रशासन से अपील है कि जिले के 27 थाना क्षेत्रों में सख्त निगरानी बिठाई जाए। थाना प्रभारियों पर जांच हो, मुखबिरी के नाम पर अपराधियों को संरक्षण देने वालों पर कार्रवाई हो। एसपी और आईजी स्तर पर विशेष अभियान चलाया जाए। अगर यह मिलीभगत जारी रही, तो आने वाले दिनों में नशे से जुड़े अपराध और बढ़ेंगे, और युवा पीढ़ी का भविष्य अंधकारमय हो जाएगा।
जौनपुर पुलिस ने इन आरोपों पर कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं की है, लेकिन हाल की कुछ कार्रवाइयों से लगता है कि दबाव बढ़ने पर एक्शन होता है। सवाल यह है कि क्या उच्चाधिकारी इस जाल को तोड़ पाएंगे, या नशे का यह तांडव जारी रहेगा?

