जौनपुर के सरपतहां थाना क्षेत्र से चोरी के आरोप में जेल भेजे गए 24 वर्षीय अजीत कुमार की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत ने जिला जेल प्रशासन की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा कर दिया है। मृतक के परिजनों का आरोप है कि जेल के भीतर उचित देखरेख और समय पर इलाज न मिलने के कारण युवक की जान गई है। पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, अजीत को 19 फरवरी 2026 को मेडिकल परीक्षण के बाद पूरी तरह स्वस्थ पाए जाने पर न्यायालय के आदेशानुसार जिला जेल भेजा गया था। पुलिस प्रक्रिया के दौरान आरोपी का स्वास्थ्य सामान्य था, लेकिन जेल की दहलीज पार करते ही महज 24 घंटे के भीतर उसकी मौत हो जाना जेल प्रबंधन की बड़ी विफलता को दर्शाता है। यह घटना दर्शाती है कि जेल के भीतर कैदियों के स्वास्थ्य और सुरक्षा को लेकर बरती जाने वाली सावधानी केवल कागजों तक सीमित है।
जेल प्रशासन की भूमिका पर सवाल इसलिए भी गहरे हो रहे हैं क्योंकि नियमानुसार किसी भी नए बंदी के जेल में प्रवेश के समय वहां के चिकित्सा विभाग द्वारा गहन स्वास्थ्य परीक्षण किया जाता है। यदि अजीत की हालत में कोई गिरावट थी, तो उसे तत्काल उच्च चिकित्सा केंद्र क्यों नहीं भेजा गया? परिजनों का का आरोप यह भी है कि पुलिस ने युवक के साथ मारपीट की थी लेकिन मेडिकल रिपोर्ट में ऐसा कुछ नहीं आया, जबकि जेल प्रशासन की अभिरक्षा में जाने के बाद उसे वह सुरक्षा और उपचार नहीं मिला जिसकी एक नागरिक को उम्मीद होती है। जेल की चारदीवारी के भीतर घटी यह घटना वहां की स्वास्थ्य सुविधाओं और निगरानी तंत्र के पूरी तरह ध्वस्त होने की गवाही दे रही है।
वर्तमान में इस मामले ने तूल पकड़ लिया है और स्थानीय स्तर पर जेल प्रशासन के खिलाफ आक्रोश व्याप्त है। मामले की गंभीरता को देखते हुए अब सबकी नजरें पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट पर टिकी हैं, जो यह स्पष्ट करेगी कि जेल में दाखिल होने के बाद ऐसी क्या परिस्थिति बनी कि एक स्वस्थ युवक की अचानक जान चली गई। परिवार ने अब इस मामले में न्यायिक जांच की मांग की है ताकि जेल के भीतर हुई इस बड़ी लापरवाही की सच्चाई सामने आ सके। यह घटना एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर करती है कि जेल जैसे संवेदनशील स्थानों पर आखिर क्यों कैदियों के मानवाधिकारों और उनके स्वास्थ्य की सुरक्षा करने में प्रशासन बार-बार विफल साबित हो रहा है।

