उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता का माहौल बनाने और भेदभाव को समाप्त करने के उद्देश्य से तैयार किए गए UGC के नए नियमों को लेकर देश भर में एक व्यापक कानूनी और सामाजिक बहस छिड़ गई है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा इन नियमों के क्रियान्वयन पर लगाई गई रोक के बाद अब केंद्र सरकार द्वारा इस पर पुनर्चिंतन किए जाने की बात सामने आई है। इस पूरे विवाद के केंद्र में नियमों की परिभाषाएं और उनसे जुड़े विभिन्न वर्गों के हित शामिल हैं।
रेगुलेशन 3(1)(c) की परिभाषा पर गहराया विवाद
याचिकाकर्ताओं और कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, इस पूरे विवाद का मुख्य कारण नए दिशानिर्देशों के तहत शामिल किया गया ‘रेगुलेशन 3(1)(c)’ है। इस प्रावधान के तहत जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा को विशेष रूप से अनुसूचित जातियों (SC), अनुसूचित जनजातियों (ST) और अन्य पिछड़ा वर्गों (OBC) के सदस्यों के साथ होने वाले अनुचित या भेदभावपूर्ण व्यवहार पर केंद्रित किया गया था।
समर्थकों का तर्क था कि परिसरों में ऐतिहासिक और सामाजिक विषमताओं के कारण इन वर्गों के छात्रों को विशेष सुरक्षात्मक तंत्र (Protection Framework) की सख्त आवश्यकता है, ताकि वे बिना किसी भय या उत्पीड़न के अपनी शिक्षा पूरी कर सकें।
सामान्य वर्ग की आपत्तियां और भेदभाव के आरोप
दूसरी ओर, सामान्य (गैर-आरक्षित) वर्ग के छात्रों और उनके प्रतिनिधियों ने इस ढांचे पर गंभीर आपत्तियां दर्ज कराते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दायर की थीं। उनका तर्क था कि इस प्रकार की एकतरफा और संकीर्ण परिभाषा से शिक्षण संस्थानों का माहौल संतुलित रहने के बजाय पक्षपातपूर्ण हो सकता है।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि भेदभाव किसी भी छात्र के साथ हो सकता है, चाहे वह किसी भी श्रेणी का हो। यदि सुरक्षात्मक ढांचा केवल कुछ वर्गों के लिए ही सीमित रहेगा, तो इससे गैर-आरक्षित वर्ग के छात्रों के खिलाफ पूर्वग्रह या भेदभाव को बढ़ावा मिल सकता है। इन्हीं तर्कों और अंतर्विरोधों को देखते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने नए नियमों के क्रियान्वयन पर रोक लगाते हुए 2012 के पुराने नियमों को ही जारी रखने का आदेश दिया था।
समानता और संतुष्टि का संतुलन बनाने की चुनौती
चीफ जस्टिस सूर्यकांत की इस टिप्पणी ने कि “नीति ऐसी होनी चाहिए जिससे सभी युवा संतुष्ट महसूस करें”, इस कानूनी विवाद को एक नया मोड़ दिया है। अदालत का यह मानना है कि परिसरों में किसी भी रूप में उत्पीड़न रोकने की व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जो निष्पक्ष, समावेशी और सभी वर्गों का विश्वास जीतने वाली हो।
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अब जब केंद्र सरकार ने एक समीक्षा समिति गठित करने का संकेत दिया है, तो यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार किस प्रकार विभिन्न वर्गों की चिंताओं को समायोजित करते हुए एक ऐसा संतुलित और न्यायसंगत ढांचा तैयार करती है, जो परिसरों को सुरक्षित भी बनाए और किसी भी वर्ग में असंतोष की भावना न पनपने दे।


