लखनऊ के कई चौराहों पर विजयादशमी से ठीक पहले एक विवादित पोस्टर चिपक गया। नाम दिया गया – “सनातन भारत के विरोधी दशानन रावण”। सनातन रक्षा संगठन नाम की संस्था ने ये पोस्टर लगाए।
पोस्टर में रावण के दस सिरों पर अलग-अलग लोगों की तस्वीरें चिपकाई गई हैं। मुख्य चेहरे के रूप में अतीक अहमद को रखा गया है। सिरों पर ये नाम दिख रहे हैं:
अतीक अहमद, अखिलेश यादव, राहुल गांधी, एलन मस्क, इल्हान उमर, मोहम्मद यूनुस, जॉर्ज सोरोस, प्रशांत भूषण, मुख्तार अंसारी और आजम खान।
ये सूची देखकर साफ हो जाता है कि पोस्टर काफी विवादास्पद है। अलग-अलग क्षेत्रों और पृष्ठभूमि के लोगों को एक ही फ्रेम में रख दिया गया है। विपक्षी नेताओं को विदेशी हस्तियों और अन्य व्यक्तियों के साथ एक ही श्रेणी में दिखाना उचित नहीं लगता। सनातन रक्षा संगठन ने इन पोस्टरों को लखनऊ के कई चौराहों पर लगाया, जिसके बाद समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने कुछ पोस्टर हटा भी दिए।
दशहरा बुराई पर अच्छाई की जीत का त्योहार है। रावण के पुतले जलाए जाते हैं ताकि समाज को संदेश मिले कि अन्याय और अहंकार का अंत होता है। लेकिन यहां रावण के सिरों पर राजनीतिक दुश्मनों और विदेशियों की तस्वीरें चिपकाकर एक सस्ता संदेश देने की कोशिश की गई है। सनातन के नाम पर इस तरह की सस्ती सियासत करना न सनातन का सम्मान बढ़ाता है, न लोकतंत्र का।
जब कोई संगठन विपक्षी नेताओं को विदेशी हस्तियों के साथ एक ही श्रेणी में रखता है, तो इससे उसकी विश्वसनीयता प्रभावित होती है।एलन मस्क को स्टारलिंक के बयानों की वजह से, इल्हान उमर को उनके राजनीतिक रुख की वजह से, जॉर्ज सोरोस को पुरानी साजिश थ्योरी की वजह से और प्रशांत भूषण को उनके बयानों की वजह से रावण बना देना आसान है। लेकिन ये तरीका बहस को नहीं, नफरत को बढ़ावा देता है।
समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने कुछ पोस्टर फाड़ दिए। राजनीतिक असहमति को व्यक्त करने का यह एक तरीका था। जब अलग-अलग व्यक्तियों को एक ही श्रेणी में रखा जाता है, तो ऐसी प्रतिक्रियाएं सामने आना स्वाभाविक है।
सनातन रक्षा संगठन ने दावा किया कि ये लोग भारत विरोधी गतिविधियों में शामिल हैं या तख्तापलट का सपना देखते हैं। पोस्टर का तरीका इन आरोपों को काफी सतही और प्रचारवादी बना देता है। अगर किसी के विचारों से असहमति है तो बेहतर होता कि तर्क के जरिए जवाब दिया जाता। रावण के सिर पर फोटो चिपकाकर सड़क पर चिपकाना उचित तरीका नहीं लगता।
दशहरे के मौके पर ऐसे पोस्टर लगाना त्योहार की भावना के अनुरूप नहीं लगता। रावण दहन बुराई का प्रतीक है, लेकिन जब उस प्रतीक का इस्तेमाल राजनीतिक विरोध जताने के लिए किया जाता है, तो उसका मूल संदेश कमज़ोर पड़ जाता है।
लखनऊ के इन पोस्टरों ने एक बार फिर दिखा दिया कि कुछ संगठन अभी भी पुराने तरीकों से राजनीति करना चाहते हैं। सनातन की रक्षा का दावा करने वाले अगर खुद सनातन के मूल्यों – सत्य, संयम और विवेक – को भूल जाएं, तो उनका दावा रह जाता है।
इस तरह की विभाजनकारी राजनीति न तो देश के हित में है, न समाज के।
देश की राजनीति, चुनाव और जनहित से जुड़े मुद्दों पर भरोसेमंद खबरें और विस्तृत रिपोर्ट Akhandrashtra.com पर पढ़ सकते हैं। ऐसी ही खबरों के लिए हमारी वेबसाइट पर विज़िट करें।

