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Akhand Rashtra News > एक्सक्लूसिव > अरुणाचल प्रदेश: चीन के नामकरण पर भारत का करारा जवाब – “यह हमारा अभिन्न अंग है, कोई बदलाव मंजूर नहीं!”
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अरुणाचल प्रदेश: चीन के नामकरण पर भारत का करारा जवाब – “यह हमारा अभिन्न अंग है, कोई बदलाव मंजूर नहीं!”

Digital Desk - Lucknow
Last updated: May 14, 2025 7:49 pm
Digital Desk - Lucknow
1 year ago
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अरुणाचल प्रदेश: चीन के नामकरण पर भारत का करारा जवाब - "यह हमारा अभिन्न अंग है, कोई बदलाव मंजूर नहीं!"
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– ओमकार त्रिपाठी

नई दिल्ली: भारत और चीन के बीच सीमा विवाद एक बार फिर सुर्खियों में है, और इस बार विवाद का केंद्र है अरुणाचल प्रदेश। 14 मई 2025 को चीन ने अरुणाचल प्रदेश के 27 स्थानों के नाम बदलने की कोशिश की, जिसे भारत ने सख्ती से खारिज कर दिया। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जयसवाल ने इस कदम को “निरर्थक और हास्यास्पद” करार देते हुए कहा, “चीन की यह व्यर्थ कोशिश वास्तविकता को नहीं बदल सकती। अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न हिस्सा था, है और हमेशा रहेगा।” यह घटना दोनों देशों के बीच पहले से मौजूद तनाव को और बढ़ाने वाली है, खासकर तब जब हाल ही में लद्दाख में सैन्य तनाव को कम करने के लिए कुछ समझौते हुए थे।

चीन ने अरुणाचल प्रदेश को “जांगनान” या “दक्षिण तिब्बत” कहकर अपनी ऐतिहासिक दावेदारी को मजबूत करने की कोशिश की है। उसने 27 स्थानों के लिए नए नाम जारी किए, जिनमें 15 पहाड़, 5 आवासीय क्षेत्र, 4 पहाड़ी दर्रे, 2 नदियां और 1 झील शामिल हैं। यह पहली बार नहीं है जब चीन ने ऐसी हरकत की हो। 2017 से अब तक यह उसकी पांचवीं कोशिश है। 2017 में 6 स्थानों, 2021 में 15, 2023 में 11, और मार्च 2024 में 30 स्थानों के नाम बदलने के बाद अब मई 2025 में फिर से 27 स्थानों का नामकरण किया गया। इनमें से ज्यादातर इलाके भारत के नियंत्रण में हैं, और भारत ने हर बार इस कदम को सिरे से खारिज किया है।

विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में कहा, “चीन की ओर से बार-बार इस तरह की रचनात्मक नामकरण की कोशिशें की जा रही हैं, लेकिन यह अटल सत्य को नहीं बदल सकता कि अरुणाचल प्रदेश भारत का हिस्सा है।” भारत ने इसे केवल एक प्रतीकात्मक कदम माना है, जो जमीन पर कोई बदलाव नहीं ला सकता। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने पहले भी इस तरह की हरकतों पर टिप्पणी करते हुए कहा था, “अगर मैं आपके घर का नाम बदल दूं, तो क्या वह मेरा हो जाएगा? अरुणाचल प्रदेश भारत का था, है और रहेगा। नाम बदलने से कुछ नहीं होगा।

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यह विवाद भारत और चीन के बीच लंबे समय से चले आ रहे सीमा विवाद का हिस्सा है। दोनों देश 3,488 किलोमीटर लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) साझा करते हैं, जो स्पष्ट रूप से चिह्नित नहीं है। अरुणाचल प्रदेश को लेकर चीन का दावा 1914 के शिमला समझौते से उपजा है, जिसमें मैकमोहन रेखा को सीमा के रूप में मान्यता दी गई थी। लेकिन चीन इस समझौते को मान्यता नहीं देता, क्योंकि उस समय तिब्बत स्वतंत्र नहीं था। दूसरी ओर, भारत का कहना है कि अरुणाचल प्रदेश उसका अभिन्न हिस्सा है और 1947 में आजादी के बाद से इसे पूरी तरह से एकीकृत किया गया है।

चीन की यह रणनीति केवल नामकरण तक सीमित नहीं है। यह एक व्यापक रणनीति का हिस्सा है, जिसमें वह क्षेत्रीय दावों को मजबूत करने के लिए प्रचार, मनोवैज्ञानिक दबाव और कानूनी दावों का सहारा लेता है। 2020 में गलवान घाटी में हुए हिंसक संघर्ष के बाद से दोनों देशों के बीच तनाव चरम पर पहुंच गया था। उस समय भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच झड़प में 20 भारतीय सैनिक शहीद हो गए थे, जबकि चीन ने अपने नुकसान को सार्वजनिक नहीं किया। इसके बाद से दोनों देशों ने सीमा पर अपनी सैन्य उपस्थिति बढ़ा दी है, और कई दौर की सैन्य और कूटनीतिक वार्ताएं हुई हैं। हाल ही में अक्टूबर 2024 में दोनों देशों ने एलएसी पर गश्त को लेकर एक समझौता किया था, जिसे तनाव कम करने की दिशा में एक कदम माना गया। लेकिन चीन की इस ताजा हरकत ने इस समझौते को कमजोर करने का काम किया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि चीन की यह हरकत न केवल क्षेत्रीय दावों को मजबूत करने की कोशिश है, बल्कि भारत पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने का भी एक प्रयास है। कुछ विश्लेषकों का कहना है कि यह कदम घरेलू स्तर पर राष्ट्रवाद को भड़काने के लिए भी हो सकता है, क्योंकि चीन की आंतरिक राजनीति में राष्ट्रवादी भावनाएं अहम भूमिका निभाती हैं। दूसरी ओर, कुछ लोग इसे भारत के बढ़ते अंतरराष्ट्रीय प्रभाव को रोकने की कोशिश के रूप में देखते हैं, खासकर तब जब भारत ने हाल के वर्षों में नेपाल और भूटान जैसे पड़ोसी देशों के साथ अपने संबंधों को मजबूत किया है।

भारत ने भी इस मुद्दे पर जवाबी कदम उठाने की कोशिश की है। पिछले साल मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया था कि भारतीय सेना की सूचना युद्ध शाखा ने तिब्बत क्षेत्र में 30 स्थानों के नए नाम तैयार किए थे, हालांकि इसकी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई। भारत ने यह भी स्पष्ट किया है कि वह अपनी सीमा की रक्षा के लिए पूरी तरह तैयार है। अरुणाचल प्रदेश में सैन्य बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए कई परियोजनाएं शुरू की गई हैं, जैसे सेला टनल, जो तवांग जैसे रणनीतिक क्षेत्रों तक हर मौसम में कनेक्टिविटी सुनिश्चित करती है।

चीन की इस हरकत का असर न केवल भारत-चीन संबंधों पर पड़ेगा, बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता पर भी सवाल खड़े होंगे। अरुणाचल प्रदेश में यारलुंग त्सांगपो नदी पर चीन द्वारा बनाए जा रहे दुनिया के सबसे बड़े हाइड्रोइलेक्ट्रिक डैम ने भी चिंताएं बढ़ा दी हैं। यह नदी भारत में सियांग और फिर ब्रह्मपुत्र बनकर बहती है, और विशेषज्ञों का कहना है कि अगर चीन इस डैम से पानी छोड़ता है, तो अरुणाचल प्रदेश, असम और बांग्लादेश में भयानक बाढ़ आ सकती है। 2000 में ऐसी ही एक घटना में अरुणाचल में 10 से ज्यादा पुल बह गए थे।

भारत ने इस मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय का भी ध्यान खींचने की कोशिश की है। हाल ही में अमेरिका ने भी अरुणाचल प्रदेश को भारत का हिस्सा मानने की बात कही थी, जिससे चीन भड़क गया था। भारत का मानना है कि शांति और स्थिरता के लिए दोनों देशों को मिलकर काम करना होगा, लेकिन चीन की ऐसी हरकतें इस प्रक्रिया में बाधा डालती हैं।

अंत में, भारत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता से कोई समझौता नहीं करेगा। अरुणाचल प्रदेश के लोगों ने भी इस मुद्दे पर एकजुटता दिखाई है और केंद्र सरकार के रुख का समर्थन किया है। यह विवाद भविष्य में दोनों देशों के बीच संबंधों को और जटिल बना सकता है, लेकिन भारत की स्थिति दृढ़ है – “अरुणाचल प्रदेश उसका है, और रहेगा।”

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