–शिवपूजन पांडे, वरिष्ठ पत्रकार
देश में बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार के बीच यदि कोई और चीज तेजी से बढ़ रही है तो वह है ,कथावाचकों और पाखंडी संतो की संख्या और कोई चीज लगातार कमजोर हो रही है तो वह है सनातन और हिन्दुत्व। आज देश में इतने कथावाचक हैं कि यदि एक कथावाचक सिर्फ एक जिले में सनातन को मजबूत करने का संकल्प ले ले तो पूरे देश में सनातन की आंधी बहने लगेगी। अलबत्ता दूसरों को भौतिक सुख सुविधाओं से दूर रहने की सलाह देने वाले कथावाचक अत्याधुनिक सुख सुविधाओं से परिपूर्ण हो चुके हैं। कभी घर-घर और मंदिरों में कथा कहने वाले कथावाचक अरबपति बन चुके हैं। करोड़ों की गाड़ी में घूम रहे हैं तथा जनता के जान माल की सुरक्षा करने के लिए नियुक्त पुलिसकर्मी और अधिकारी उनकी व्यक्तिगत सुरक्षा कर रहे हैं। जहां तक उनकी संपत्ति का सवाल है आंकड़ों पर अगर नजर दौड़ाएं तो पिछले 10 वर्षों में उनकी संपत्ति सुरसा के मुख की तरह लगातार बढ़ रही है। अंध भक्तों के साथ-साथ सरकार का वरदहस्त उनके ऊपर है। ऐसे में कोई यह पूछने का दुस्साहस नहीं कर सकता कि उन्होंने अपार संपत्ति होने के बावजूद सरकार को कितना इनकम टैक्स दिया है। आयकर विभाग जहां नौकरी करने वाले लोगों की एक-एक पैसे आय का हिसाब मांगता है, वहीं ऐसे लोगों की तरफ नजर उठाकर भी नहीं देखता। चलिए सनातन के प्रचार और हिंदुत्व के लिए उनके द्वारा अपार संपत्ति बनाने की बात भी भूल जाते हैं। परंतु यक्ष प्रश्न यह सामने आता है कि लोगों को उनसे सनातन और हिंदुत्व को और मजबूत बनाने की जो उम्मीदें होती हैं , उसमें वह कितना खरा उतर रहे हैं ? देखा जाए तो सनातन और हिंदुत्व जितना अब खतरे में दिखाई दे रहा है, उतना कभी नहीं रहा। यह बात खुद कथावाचकों द्वारा समय-समय पर कही जाती है। एक तरफ जहां धर्मांतरण का ग्राफ तेजी से बढ़ रहा है, साधारण मौलवी और साधारण पादरी आदिवासी और गरीब इलाकों में जाकर हिंदुओं का धर्मांतरण कराने में लगे हैं वहीं कथित पाखंडी संत और कथित कथावाचक अमीरों के घर जाकर अपनी तिजोरी भरने में लगे हैं। इनके पास ऐसे इलाकों में जाकर कथा कहने या सत्संग करने का समय नहीं है। ऐसा नहीं है कि इनका प्रभाव लोगों पर नहीं पड़ेगा परंतु उसके लिए संत तुकाराम, संत ज्ञानेश्वर, संत रामदास की तरह बनना पड़ेगा, उनकी जीवन शैली और कार्य प्रणाली अपनानी होगी, जो इनके बस का तो बिल्कुल नहीं है। अधिकांश लोग तो पूरी तरह से एयर कंडीशन के आवरण में रह रहे हैं। जिन मठों से समरसता की गंगा बहनी चाहिए थी, जहां से भेदभाव को दूर कर संगठित हिंदू समाज की बात होनी चाहिए थी, वहां किसी फाइव स्टार होटल की तरह विलासितापूर्ण जीवन बिताया जा रहा है। देश को आजाद कराने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने वाले मठ , अब सिलेक्टिव लोगों की आवाजाही तक सीमित हो गया है। देखा जाए तो हिंदू समाज में भेदभाव पैदा करने में ऐसे लोगों का प्रमुख हाथ रहा। सिर्फ अमीरों के घर हाजिरी लगाने वाले पाखंडी संत और कथावाचकों को देखकर आम आदमी सोचता है कि क्या मैं उस धर्म का हिस्सा नहीं हूं, जो हमारे बीच नहीं आते। हमसे भेदभाव करते हैं। अन्य धर्मों के लोग इसी का फायदा उठाते हैं। हमारे यहां धर्म के ठेकेदार अपना बैंक बैलेंस बढ़ाने में लगे हैं और उनके ठेकेदार आदिवासी और दलित बस्तियों में रहकर धर्मांतरण का पाठ पढ़ा रहे हैं। दूसरों को धन दौलत से दूर रहकर भक्ति का रसपान करने की नसीहत देने वाले धन के इतने प्यासे हैं कि करोड़ों अरबों की संपत्ति बनाने के बावजूद उनकी प्यास नहीं बुझ रही है। एक बात तो साफ है कि जहां एक तरफ पादरी और मौलवी अपने धर्म को बचाने के साथ-साथ धर्मांतरण के माध्यम से हिंदुओं को भी अपने धर्म में शामिल कर रहे हैं, वहीं पाखंडी संतो और कथावाचकों की बढ़ती संख्या के बावजूद हम लगातार कमजोर हो रहे हैं। वजह साफ है–मौलवी और पादरी बिना किसी भेदभाव या लालच के काम कर रहे हैं और हमारे ठेकेदार गरीब जन मानस को नजरअंदाज करते हुए अपनी तिजोरी भरने में लगे हैं। एक समय आएगा जब जनता ठगी के गोरखधंधे के खिलाफ खुद खड़ी होगी और इनसे पूरा हिसाब लेगी।

