जौनपुर। 13 मई 2024—यह तारीख पत्रकारिता की आत्मा पर एक गहरे ज़ख्म की गवाही देती है। इसी दिन दिनदहाड़े टीवी पत्रकार आशुतोष श्रीवास्तव को गोलियों से भून दिया गया था। एक साल बीत गया, लेकिन परिवार, पत्रकारिता जगत और जनमानस का दर्द कम नहीं हुआ—बल्कि और गहराता गया।मंगलवार को आशुतोष श्रीवास्तव की पहली पुण्यतिथि पर उनके पैतृक गांव सबरहद में श्रद्धांजलि सभा आयोजित हुई। रामलीला कमेटी द्वारा आयोजित इस सभा में जिले भर से पत्रकार, राजनीतिक दलों के नेता और सामाजिक कार्यकर्ता बड़ी संख्या में शामिल हुए।श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए जहां एक ओर सभी की आंखें नम थीं, वहीं दूसरी ओर आक्रोश भी उफान पर था। वजह स्पष्ट है—मुख्य आरोपी नासिर जमाल समेत दो आरोपी अब भी कानून की गिरफ्त से बाहर हैं।क्या पुलिस धनबल और रसूख के आगे झुक गई है?सभा में मौजूद लोगों ने आरोप लगाया कि पत्रकार आशुतोष की हत्या का मुख्य आरोपी नासिर जमाल अकूत दौलत और राजनीतिक रसूख का मालिक है। इसी वजह से पुलिस उसे गिरफ्तार करने से परहेज कर रही है।यह एक बेहद गंभीर सवाल है जो न्याय प्रणाली और कानून व्यवस्था की साख पर सीधा हमला करता है।शब्दों में नहीं समाया आक्रोश, उठी मांग—अब आर-पार की लड़ाईपरिवार के सदस्यों—संतोष श्रीवास्तव, परितोष श्रीवास्तव, अतुल श्रीवास्तव, अमित और अर्पित श्रीवास्तव ने पीड़ा और आक्रोश के स्वर में कहा, “अगर पत्रकार सुरक्षित नहीं है, तो फिर कौन है?”सभा में भाजपा नेता सूर्यप्रकाश सिंह, पत्रकार राजकुमार सिह,आनंद सिंह, पत्रकार सुजीत मिश्रा, विनोद शाहू, राकेश अग्रहरि, डॉ. आर.के. वर्मा, डॉ. पालीवाल, सर्वेश शास्त्री सहित अन्य गणमान्य जन उपस्थित रहे।हर वक्ता की जुबान पर बस एक ही मांग थी—“मुख्य आरोपी को अविलंब गिरफ्तार किया जाए, नहीं तो आंदोलन तेज़ होगा।”पत्रकारिता की हत्या के दोषियों को बचाना, लोकतंत्र की हत्या है।यह श्रद्धांजलि सभा नहीं, एक ललकार थी—सत्ता और व्यवस्था के कानों में गूंजती हुई। अगर अब भी पुलिस प्रशासन ने आंखें मूंदे रखीं, तो यह चुप्पी सिर्फ एक परिवार की नहीं, पूरे समाज की चीख में तब्दील हो जाएगी।अब इंतजार नहीं, इंसाफ चाहिए—और तुरंत चाहिए।

