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Akhand Rashtra News > ताज़ा ख़बरें > पाकिस्तान की सेना, मौलवी और आतंकवादी तीनों षड्यंत्रकारी 
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पाकिस्तान की सेना, मौलवी और आतंकवादी तीनों षड्यंत्रकारी 

Omkar Tripathi
Last updated: May 27, 2025 3:18 pm
Omkar Tripathi
1 year ago
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पाकिस्तान की सेना, मौलवी और आतंकवादी तीनों षड्यंत्रकारी 
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–शांतिश्री धुलीपुड़ी पंडित, कुलगुरू, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय 

आज पाकिस्तान आर्थिक रूप से दिवालिया है, लेकिन, आतंकवाद से समृद्ध है। आईएमएफ जैसी वैश्विक संस्थाओं की आर्थिक सहायता को भी इसी डीप स्टेट की औपचारिक अर्थव्यवस्था को बनाए रखने में प्रयोग किया जाता है। जिससे वैश्विक जिहाद के काले बाजार फलते-फूलते रहते हैं। “डीप स्टेट” तुर्की शब्द “डेरिन डेवलेट (derin devlet)” से लिया गया है, जिसका अंग्रेज़ी में शाब्दिक अर्थ “डीप स्टेट” होता है। तुर्की में, इसका मतलब लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार पर हावी होने वाले गैर-निर्वाचित तत्त्वों से है। पाकिस्तान में “डीप स्टेट” से तात्पर्य शक्तिशाली सैन्य नेताओं, मौलवियों और आतंकियों द्वारा नियंत्रित सरकार से है। स्टीफन किन्ज़र की पुस्तक, ओवरथ्रो (Overthrow), ने कई महाद्वीपों पर अमेरिका द्वारा किये गए “सेंचुरी ऑफ रशीम (century of regime change)” मिशनों का वृत्तांत लिखा है। उदाहरण के लिये, बांग्लादेश में शेख हसीना सरकार को हटाने के लिये अमेरिकी डीप स्टेट को दोषी ठहराया जा रहा है।

क्या आज पाकिस्तान में मौलवी, सैन्य और आतंकवादी के बीच कोई मौलिक अंतर बचा है? तो नहीं। उत्तर असहज करने वाला, किंतु संदिग्ध “नहीं” है। ये तीनों कोई प्रतिस्पर्धी शक्ति केंद्र नहीं हैं, बल्कि इस षड्यंत्रकारी राज्य के तीन चेहरे हैं। यह अतिशयोक्ति लग सकता है, लेकिन दुनिया ने दशकों से पाकिस्तान इस भूराजनीति का हिस्सा बनकर इसकी पुष्टि भी करता रहा है। ये सारी बातें उसे एक आतंकवादी राज्य साबित करने के लिए पर्याप्त हैं। पाकिस्तान आज आतंकवादी अभियांत्रिकी की फैक्ट्री बन चुका है। उसके सैन्य – औद्योगिक संकुल सिर्फ हथियारों का ही नहीं, बल्कि आतंकवादियों की भी उत्पादन स्थली बन चुका है। पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने 2017 में संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में ठीक कहा था: “भारत ने आईआईटी, आईआईएम बनाए; पाकिस्तान ने टेरर कैंप बनाए।” भारत का बाद में का वक्तव्य इस बात को और भी स्पष्ट करता है—पाकिस्तान “टेररिस्तान” है, एक देश जो उन्माद में डूबा और जिहाद के विचारधारा से जुड़ा है। तो, आइए देखते हैं कि इस आतंकवाद की अर्थव्यवस्था को कौन पोषित करता है और इसे कौन वैधता देता है? सबसे महत्वपूर्ण यह है कि इसकी असली कीमत कौन चुकाता है?

रक्तरंजित और रक्तपिपासु अर्थव्यवस्था:

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आज पाकिस्तान आर्थिक रूप से दिवालिया है लेकिन, विडंबना से, आतंक में समृद्ध है। आईएमएफ की सहायता उसके औपचारिक अर्थव्यवस्था को बनाए रखती है, जबकि अनौपचारिक नेटवर्क वैश्विक जिहाद के काले बाजार में फलते-फूलते रहते हैं। क्या आईएमएफ यह जानता है कि उसके डॉलर केवल भोजन नहीं बल्कि पाकिस्तान और सीमा पार भारत में अशांति भी पैदा कर सकते हैं? क्या अंतरराष्ट्रीय समुदाय इतना भोला है या इतनी मिलीभगत कर रहा है कि पैसे के उपयोग का पता नहीं लगा सकता? वह बहुत सारा रक्तधन आतंकवाद को ईंधन देता है, धर्मार्थ संगठन, इस्लामी मदरसों और तथाकथित अंतरराष्ट्रीय एनजीओ के माध्यम से चश्मदीद नकाब के पीछे भी दोहन किया जाता है। यह अनुमान नहीं बल्कि अच्छी तरह से प्रमाणित तथ्य है। फाइनेंशियल एक्सन टास्क फोर्स (FATF), अपने मापदंडों के बावजूद, पाकिस्तान को उसकी टेरर फाइनेंसिंग को रोकने में विफलता के कारण ग्रे लिस्ट में डाल चुका है। यहां तक कि जब इसे अस्थायी रूप से हटा दिया गया, तो इससे जुड़े मुद्दे अभी भी मौजूद रहे। मामला और भी गंभीर है, तुर्की जैसे देश, अपने नव- ऑटोमन स्वप्न के साथ, इस राज्य-प्रायोजित जिहाद को संरक्षण देने लगी हैं। राष्ट्रपति एरडोगन का पाकिस्तान का कूटनीतिक मंचों पर खुलकर समर्थन देना, जिसमें कश्मीर और फिलिस्तीन की एक समान तुलना करना भी शामिल है। यह महज सौदेबाजी ही नहीं, एक षडयंत्र भी है। यह एक तरह की सधी हुई सहमति भी है। अंकारा सिर्फ इस्लामाबाद को वैधता प्रदान नहीं कर रहा है बल्कि अपने इस्लामी कथानक के माध्यम से आतंकवाद का छद्म समर्थन कर रहा है। इसमें विरोधाभास यह है कि एक देश जो गेहूं या तेल (यहां तक कि चाय) की कीमत भुगतान नहीं कर पाता, उसके पास जैश-ए-मोहम्मद (JeM) और लश्कर-ए-तैयबा (LeT) जैसे संगठनों की अथाह फंडिंग का रहस्य क्या है। यह पैसा कहां से आता है? छद्म लाभार्थियों से या नार्को आतंकवाद से? या सरकार द्वारा छूट के नाम पर दी जा रहा हर्जाने की आड़ में आतंकी फंडिग हो रही है? इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि पाकिस्तान सरकार ने 14 करोड़ रुपये (लगभग US$1 मिलियन) आतंकवादी मसूद अजहर के JeM फ्रंट को मदरसा अनुदान के नाम पर आवंटित किया है। क्या यही है पाकिस्तान का शासन, जिसे आईएमएफ सहायता देने का दावा करता है?

बेहद सजीव संबंध:

पाकिस्तान के सैन्य और आतंकवादी संगठन परस्पर विरोधी नहीं बल्कि अनुपूरक हैं। रक्तपात के इस खतरनाक घृणित कार्य में समान भागीदार हैं। उदाहरण के लिए, भारत की एयरस्ट्राइक के बाद का दृश्य देखें। निशाना कोई दूरस्थ घाटी या अभावमय पर्वतीय क्षेत्र नहीं था। यह JeM का एक परिष्कृत प्रशिक्षण शिविर था, जिसमें सैटेलाइट फोन, निवास, कक्षाएं और यहां तक कि परेड मैदान भी था। यह कोई आतंक टुकड़ी नहीं बल्कि आतंक की अकादमी थी। क्या हम भूल गए हैं, या विश्व भूल जाता है, कि संयुक्त राज्य अमेरिका ने ओसामा बिन लादेन को कहाँ पाया था? क्या यह तोरा बोरा की गुफाओं से मिला था, या फिर पाकिस्तानी मिलिट्री अकादमी से महज 2 किलोमीटर दूर एबटाबाद में था? जब कोई पाक सैनिक मरता है, तो शायद ही इतनी धूमधाम से उसका अंतिम संस्कार होता है? लेकिन जब कोई आतंकवादी मरता है, तो वह निश्चित रूप से उसे राज्य प्रायोजित अंतिम संस्कार और मुआवजा भी मिलता है। राज्य ने सैनिक और आत्मघाती आतंकी में अंतर की महीन रेखा को मिटा दिया है। ये कैसा दोहरापन है? 

प्रतिगामी प्रभाव (बूमरैंग इफेक्ट)

 आतंकवाद भी बिल्कुल आग की तरह है जो अपने निर्दिष्ट क्षेत्रों में ही सीमित नहीं रहता। इसके बजाय, यह उस हाथ को भी जला देता है जिसने इसे लगाया है। जिहादी आतंकवाद को कश्मीर या अफगानिस्तान तक सीमित करने वाला पाकिस्तान भ्रम बहुत पहले टूट चुका है। पाकिस्तानी राज्य अब अपने ही पाले डरावने जानवर रूपी आतंकवाद से जूझ रहा है। हाल के वर्षों में, पाकिस्तान के शहरों में बड़े आतंकवादी हमले हुए हैं। 2014 का पेशावर स्कूल नरसंहार एक राष्ट्रीय आघात था, जिसमें आतंकवादियों ने 144 से अधिक बच्चों की हत्या हुई। 2016 का लाहौर में ईस्टर पर्व पर बमबारी, 2021 का क्वेटा सरेना होटल विस्फोट, 2024 का कुर्रम हमला, शिया जुलूसों और हज़ारा समुदायों को बार-बार निशाना बनाना, सभी दर्दनाक यादें हैं। यह सबक देती हैं कि आतंकवाद पराए और परिजन में भेद नहीं करता। ये एक रूमानी और बेहद दुखद अध्याय है, जिसकी जड़ में नफरत बसी है। नफ़रत की वह पूरी संरचना, जिसे पाकिस्तान ने भारत को खून बहाने और अफगानिस्तान का दांव खेलने के लिए बनाई थी, नश्तर के अंदर उलट गई है। निर्दोष नागरिक अब वर्षों की धोखे की कीमत चुका रहे हैं। क्वेटा, कराची या पेशावर में हर बम का फोड़ना उस आतंकवाद की नीति का स्पष्ट और जोरदार प्रभाव है, जिसे पाकिस्तान सरकार दशकों से प्रसन्नता से प्रायोजित कर रही है। वहीं, पाकिस्तान के युवा, वह पीढ़ी जिसे “नया पाकिस्तान” का वादा किया गया था, अब इस धोखे को समझ रहे हैं। वे जिहाद और शहीदी के भाषण नहीं चाहते, बल्कि स्कूलों और नौकरियों की चाहत रखते हैं ताकि वे एक आरामदायक जीवन जी सकें। वे भी अपने पड़ोसियों खासकर भारत को आनंदित होते देख रहे हैं। उन्हें प्रगति के लिए पासपोर्ट चाहिए, न कि ज़हालत, जिहाद और जन्नत। वे किसी झूठे लक्ष्य की प्राप्ति के लिए मरना नहीं चाहते। 

पाकिस्तान की गीदड़ भभकी:

आज यक्ष प्रश्न यह है कि दुनिया कब तक इसे पाकिस्तान का आंतरिक मामला मानती रहेगी? भारत, अफगानिस्तान, और यहाँ तक कि पाकिस्तान में और कितने निर्दोष नागरिक मरेंगे? जब तक वैश्विक समुदाय इस आतंकवादी राज्य को फंडिंग, हथियार देना या उसकी प्रशंसा करना बंद नहीं कर देता इसकी आदत बदल नहीं सकती। अब बहुत हो चुका। पाकिस्तान का खेल का तरीका साफ है: आतंकवाद का समर्थन करो, पीड़ित बनो, और मदद की मांग करो। खुद आतंकवाद को पोषित करने के लिए, अपने आप को आतंक का पीड़ित कहना बेतुका है। आप घर में सांप पालते हैं और फिर उसके काटने की शिकायत भी करते हैं। ऐसे में, वास्तविक त्रासदी सिर्फ यह नहीं है कि पाकिस्तान आतंकवाद का समर्थन करता है, बल्कि कि वैश्विक ताकतों ने, जानबूझ कर अंधकार या रणनीतिक संलयन के माध्यम से, पाकिस्तान को ऐसा करने की अनुमति दी है।

अंतरराष्ट्रीय समुदाय की संयुक्त राष्ट्र, आईएमएफ और अन्य मुख्य शक्तियों को पाकिस्तान का समर्थन करना बंद करना चाहिए। साथ ही यह समझना चाहिए कि पाकिस्तान का एजेंडा आतंकवाद है, आतंकवाद के बारे में है, और आतंकवाद के लिए है। समय रहते, सभी को इसपर कार्रवाई करनी चाहिए। आईएमएफ को पाकिस्तान को आर्थिक सहायता देने से पहले कठोर सवाल पूछने चाहिए। ऑर्गनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कॉपरेशन (ओआईसी) को भी आत्ममंथन करना चाहिए कि क्या वह इस्लामिक सहयोग का मंच बनना चाहता है या इस्लामिक उग्रवाद का। कई मध्य पूर्वी शक्तियां जैसे सऊदी अरब और यूएई, जो आधुनिकता का स्वप्न देख रही हैं, उन्हें भी एक चुनाव करना चाहिए: या तो प्रगति के साथ खड़ा हों या आतंकिस्तान के साथ ?चाइनाऔर तुर्की का संगठन पाकिस्तान के साथ मिलकर भारत को रोकने की साजिश कर रहे हैं। इसके लिए वे सेना, आईएसआई और आतंकी संगठन को पाकिस्तान का डीप स्टेट बना चुके हैं। आतंकवाद अब केवल एक विदेशी नीति का उपकरण नहीं रहा, बल्कि पाकिस्तान में धार्मिक उग्रवाद की विचारधारा के साथ संचालित शासन की रूपरेखा बन चुका है

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ओमकार त्रिपाठी राजनीतिक विश्लेषक है, इसी के साथ पिछले कई वर्षों से उत्तर प्रदेश की जमीनी राजनीति, प्रशासनिक हलचल और खोजी पत्रकारिता (Crime & Investigative Reporting) में सक्रिय। 19 वर्ष पुराने प्रतिष्ठित अखबार दैनिक अखंड राष्ट्र (Akhand Rashtra) के स्थानीय संपादक है, Omkar Tripathi विशेष तौर पर निष्पक्ष आवाज और पारदर्शी गवर्नेंस के लिए प्रतिबद्ध है
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