अखंड राष्ट्र
पहिया रथ का धँसा हुआ है,
दलदल में वह फँसा हुआ है….
हाथ-पाँव सब बँधे हुए हैं,
गर्दन पर फन्दा कसा हुआ है….
बोली बाहर ना आ सकती है,
स्वर तंत्र सब रुँधा हुआ है….
सांसें रुक-रुक कर आती हैं….!
डर इतना अंदर तक घुसा हुआ है
कांतिहीन मुख है….चहुँ ओर यहाँ
मन-मस्तिष्क-हृदय सब ही…!
मानो अन्दर तक डरा हुआ है….
देह पसीने में डूबी है,
तन गन्ने जैसा चुसा हुआ है…
दिल-दिमाग दोनों में ही….!
कुछ बुरा-बुरा ही ठुंसा हुआ है…
वेग शून्य है सब तंत्रिका तंत्र…!
जैसे सर्प का डॅसा हुआ है….
अंग-प्रत्यंग सब के सब मित्रों….!
तीक्ष्ण बाणों से बिधा हुआ है….
सोच रहा है….हारा मन अब….
यह कि….जाने क्या….?
किस्मत में लिखा हुआ है….
फिर भी…अजीब बिडम्बना देखो
इस हालत में भी….मध्यम वर्ग…
यह कहे जा रहा हैं….कि…
विकास हुआ है….विकास हुआ है
भले देख रहे हैं…सभी यहाँ पर…
चतुराई की वक्री चालों से….
बस गिद्धों का पंख हरा हुआ है…
ज़माने में लुट जाने से पहले….
दूसरे को लूट लेने की….!
आपाधापी में प्यारे….
हर कोई यहाँ लगा हुआ है….
मित्रों… कैसे कहूँ कि….!
कर्महीन को तो स्वीकार कर लूँ …
पर यहाँ तो….सच में….!
सबका जमीर गिरा हुआ है….
गौर से देखो तो सही मित्रों…
मध्यम वर्ग…अंदर से मरा हुआ है.
इस पर भी प्यारे…..!
समय चक्र का खेल तो देखो
अपनी खुद की किस्मत पर….!
हँसी-ठिठोली-अठखेली करने का
उसको भरपूर नशा हुआ है….
हँसी-ठिठोली-अठखेली करने का
उसको भरपूर नशा हुआ है….
रचनाकार…..
जितेन्द्र कुमार दुबे
अपर पुलिस उपयायुक्त, लखनऊ
