आदि कहूँ….अंत कहूँ….
या फिर…अनंत कहूँ…
देव कहूँ ….साधु कहूँ…
या फिर….सिद्ध कोई संत कहूँ…
पर्याय किसी और का….!
भला क्यों कहूँ…?
क्यों न सीधे-सीधे…..
मैं तुम्हें….पार्वती कंत कहूँ….
या फिर….पिता एकदंत कहूँ….
नागा कहूँ….बाबा कहूँ….
औघड़ कहूँ….आवारा कहूँ…
या फिर….यायावर घुमन्त कहूँ…
चोला देख….रूप रंग भोला देख..
बार-बार मन मेरा कहे….
मैं तुम्हें सुमन्त कहूँ….
प्रसंग कहूँ….संदर्भ कहूँ….
या फिर….व्याख्या प्रचण्ड कहूँ…
कुछ कम सा लगे यह मुझे….!
इसलिये जीवन साहित्य का…!
सांगोपांग….आद्यन्त कहूँ….
रस कहूँ…..छंद कहूँ…
या फिर….अलंकार कहूँ…
दोहा कहूँ…..चौपाई कहूँ….
या फिर…..सोरठा श्रृंगार कहूँ…
पर विचार यही उठ रहा….!
कि क्यों न तुम्हें कुलवंत कहूँ…
दनुज कहूँ….मनुज कहूँ….
या फिर….किन्नर-यक्ष कहूँ….
जुड़ गया हूँ…..ऐसा सुनो….!
लाख कोई कुछ कहे…..
मैं तो तुम्हे….बे-अन्त कहूँ….
कृपा कहूँ….उपकार कहूँ….
या फिर….दानी स्वभाव कहूँ…
पर… मन यही कहे बार-बार….
प्रभाव आपका…दिग-दिगन्त कहूँ
इसके सिवा प्रभु और क्या कहूँ..?
सम्भव नहीं है दिख रहा…..
कुछ कहना तुम्हे देव…..!
जानता हूँ बस इतना कि….
जिसने तुम्हें गढ़ा जैसा….
रूप धरा तुमने वैसा….
इसलिए तुम्हें तो मैं…. !
देव मनगढ़ंत कहूँ…..
दवा कहूँ….दुआ कहूँ….
या फिर…मित्र प्रिय अत्यन्त कहूँ..
सब सही…पर….महादेव…!
अच्छा यही होगा कि…
तुम्हें मैं….धरा पर….!
अपना अरिहन्त कहूँ….
तुम्हेँ मैं….धरा पर….!
अपना अरिहन्त कहूँ….
रचनाकार…..
जितेन्द्र कुमार दुबे
अपर पुलिस उपायुक्त, लखनऊ

