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Akhand Rashtra News > ताज़ा ख़बरें > प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पाकिस्तान को सिखाया ब्रह्मोस की भाषा
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पाकिस्तान को सिखाया ब्रह्मोस की भाषा

Omkar Tripathi
Last updated: June 9, 2025 4:31 pm
Omkar Tripathi
8 months ago
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– प्रोफेसर शांतिश्री धुलीपुड़ी पंडित, कुलगुरू जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय

मोदी की रणनीति एक व्यापक रणनीति है: एक ऐसी रणनीति जो सैन्य शक्ति, आर्थिक दबाव, कूटनीतिक सटीकता और भारत के सभ्यतागत दृष्टिकोण को अपने सबसे प्रतिबद्ध विरोधी के प्रति मनोवैज्ञानिक पुनरावलोकन से जोड़ती है।

जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में पदभार संभाला, तो उनके साथ न सिर्फ धीमी अर्थव्यवस्था और छिन्न भिन्न राष्ट्रीय मनोबल था, बल्कि एक ऐसी विरासत भी थी जिसमें विदेश नीति संकोची और रणनीतिक अस्पष्टता पर आधारित थी। पहले भारत, पाकिस्तान के साथ वार्ता और व्यवहार में अत्यधिक संयम प्रदर्शित करता था, और आंतरिक मामलों का अंतरराष्ट्रीयकरण करते थे। साथ ही पूरा कालखंड संवादहीनता और विश्वासघात के कुचक्र से घिरा था। नेहरू की गलत नीतियों ने कश्मीर संघर्ष को जन्म दिया, वैश्विक राय के प्रति अव्यावहारिक श्रद्धा ने चीन युद्ध दिया। इन्दिरा गांधी ने शिमला समझौते के जरिए बांग्लादेश के मुक्तियुद्ध में मिली कठिन सैन्य जीत को बर्बाद कर दिया। भारत लंबे समय से शांति के आह्वान और कूटनीतिक शांति के बीच झूल रहा था।

लेकिन मोदी के प्रधानमंत्री बनने के साथ, उस युग का अंत हुआ। यदि कांग्रेस का युग थोथा “अमन की आशा” के साथ चिह्नित था, तो मोदी के शासनकाल में ठोस “ब्रह्मोस की भाषा”—एक ऐसा सिद्धांत जो बिना पछतावे के बदला लेने और सटीकता से हर उकसावे या शांति उल्लंघन का जवाब देने का संकेत देता है। मोदी की रणनीति व्यापक है। एक ऐसी रणनीति जो सैन्य शक्ति, आर्थिक दबाव, कूटनीतिक सूक्ष्मता और, सबसे महत्वपूर्ण, भारत के सभ्यतागत दृष्टिकोण को पुनर्स्थापित किया है। इससे एक भारत को विरोधियों पर मनोवैज्ञानिक बढ़त मिली है। यह केवल एक नई सुरक्षा नीति नहीं है, बल्कि भारत के राष्ट्रीय संकल्प की पुनःस्‍थापना है।

रणनीतिक स्पष्टता के साथ प्रतिशोध

ऑपरेशन सिंदूर सिर्फ एक सैन्य हमला नहीं था—यह भारत की नई रणनीति की एक औपचारिक घोषणा भी थी। भारत ने पाकिस्तान के अंदर गहरा आघात किया, न कि किनारे पर, न ही विवादित क्षेत्रों में, बल्कि विरोधियों के परमाणुयुक्त केंद्र पर भी हलचल मचा दी। पिछली सीमित प्रतिक्रिया में 2016 की सर्जिकल स्ट्राइक्स या 2019 के बालाकोट हवाई हमले—के विपरीत, ऑपरेशन सिंदूर एक व्यापक अभियान था। इसमें सैन्य कार्रवाई को गैर-सैन्य उपकरणों के साथ मिलाकर किया गया था: सिंधु नदी जल संधि का निलंबन, कूटनीतिक अलगाव, और सूचना युद्ध। 1960 के बाद, पहली बार भारत ने पानी का प्रयोगजी की पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था और कृषि के लिए एक रणनीतिक जीवनरेखा को एक प्रभावी रूप से हथियार के रूप में प्रयोग किया, जिससे इस्लामाबाद के शासकों को गहरा झटका पहुंचा। भारत के भीतर कई विपक्षी मानने को तैयार नहीं, जबकि पश्चिम के विशेषज्ञों और विश्लेषकों ने ध्यान दिया।

अमेरिकी रक्षा विशेषज्ञ जॉन स्पेंसर ने भारत की “प्राणघातक भौतिकी” में महारत की प्रशंसा की, जबकि ऑस्ट्रियन विमानन विश्लेषक टॉम कूपर ने इस हमले को “साफ-सुथरे विजय” के रूप में सराहा। जापानी रणनीतिक विचारक सतोरी नागाओ ने भी संयम की सराहना की, इसे “जिम्मेदार और उपयुक्त” प्रतिक्रिया कहा। ये समर्थन यह उस सिद्धांत की पुष्टि थी जिसने अंततः भारत की सैन्य क्षमता को उसकी सभ्यतागत संकल्प के साथ संरेखित किया। जो आलोचक भारत को अधिक कार्रवाई करने, यहां तक कि शासन परिवर्तन तक करने की बात कर रहे थे, वे मोदी रणनीति की बुनियादी धारणाओं को नहीं समझ रहे थे। भारत का मकसद पाकिस्तान को नष्ट करना या देश के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करना नहीं था—यह पश्चिमी तरीका है जब वे असक्षम शासन के साथ निपटते हैं।

भारत का उद्देश्य एक नई हद परिभाषित करना है। उसने स्पष्ट संदेश दिया कि हमारे ऊपर कोई भी हमला बेहद सटीक और निर्मम प्रतिक्रिया को आमंत्रित करेगा। पहले की तरह, भारत ने तीसरे पक्ष की मध्यस्थता नहीं चाही, न ही खोखले प्रयास किए। संदेश स्पष्ट था—आतंकवाद को युद्ध के समान माना जाएगा।

शक्ति के माध्यम से कूटनीति

इस प्रकार की सीधी कार्रवाई राजनीतिक इच्छाशक्ति और स्वदेशी क्षमता से भी ऐसी आई है। ऑपरेशन सिंदूर की सफलता एक औद्योगिक परिवर्तन और रणनीतिक दृष्टिकोण की कहानी भी है। मोदी का 2014 का ‘मेक इन इंडिया’ अभियान केवल एक आर्थिक नारा नहीं था—इसने आत्मनिर्भरता पर आधारित रक्षा आधुनिकीकरण की आधारशिला रखी। भारत के स्वदेशी निर्मित ब्रह्मोस मिसाइलें, एयर डिफेंस सिस्टम, और लूटरिंग मुनिशंस का प्रयोग आत्मनिर्भरता का संकेत था। भारत अब जवाबी कार्रवाई के लिए विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भर नहीं रहा। पाकिस्तान का रक्षा ढांचा, जो कि पुराने चीनी सिस्टमों के इर्द-गिर्द बुना हुआ है, उसका कुछ भी नहीं चल सका। उसकी रडार प्रणाली फेल हुई, उसकी इंटरसेप्शन क्षमता ठप हो गई, और उसकी प्रतिक्रिया बेहद हल्की रही।

विषमता स्पष्ट थी, और भारत ने पहली बार दशकों में संपूर्ण सामरिक और तकनीकी श्रेष्ठता सिद्ध कर दिया। वैश्विक भू-राजनीति में, धारणा निरोधक बनाती है। मोदी की रणनीति सिर्फ नुकसान पहुंचाने के बारे में नहीं है—यह एक ऐसी छवि बनाने के बारे में है जो नाश को डरावनी बनाती है। जब मोदी कहते हैं, “आतंक और बातचीत साथ में नहीं चल सकती,” यह केवल भाषण नहीं है। बल्कि, यह नीति है। “पानी और खून साथ नहीं बह सकते” कोई रूपक नहीं बल्कि एक दार्शनिक रणनीति है। अब पाकिस्तान को केवल सैन्य पराजय नहीं बल्कि प्रणालीगत अपमान का सामना करना पड़ रहा है। सिंधु जल संधि के पुनःवार्ता की तड़प, जो पहले निरोध का अवरोध थी, अब भारत की प्रतिक्रिया की सीधे नीति बन गई है। विश्व देख रहा है कि भारत, दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है, जो अपनी प्रमुखता को चुपचाप स्थापित कर रहा है।

भारत का सभ्यतागत जागरण

ऑपरेशन सिंदूर भारत के सैन्य उपलब्धियों में एक मील का पत्थर है, तो यह एक गहरे परिवर्तन का संकेत भी है जिसे सभ्यतागत पुनर्जागरण कहा जाना चाहिए। भारत लंबे समय से ऐसी संस्था के खिलाफ युद्ध में है जो पारंपरिक शांति और युद्ध के नियमों का पालन नहीं करता। जैसा वी एस नायपॉल ने लिखा, पाकिस्तान एक “अतर्कसंगत” राष्ट्र है, जिसमें न सिर्फ भारत के खिलाफ, बल्कि अपने अपने अतीत के विरुद्ध भी क्रोध है। इसलिए, यह केवल भारत का शत्रु राष्ट्र नहीं है बल्कि भारत का विचारधारात्मक विरोधी भी है। पाकिस्तान का मदीना विचारों से निकला जिहादी सिद्धांत है जो वेस्टफ़ालियन भावना में शांति को नहीं समझता। वेंकट धूलिपाला का प्रमुख कार्य, “क्रिएटिंग अ न्यू मदीना”, यह विस्तार से बताता है कि पाकिस्तान को सिर्फ एक शरणस्थली नहीं बल्कि एक पैगम्बर के इस्लामी राज्य के रूप में देखा गया था, जिसका उद्देश्य इस्लामिक दुनिया का आदेश फिर से स्थापित करना था।

यह भारत के धर्मनिरपेक्ष, बहुलवादी नैतिकता के विरुद्ध खड़ा है। मोदी रणनीति का सबसे अहम योगदान उस चेतना को जागरूक करना है। भारत को याद दिलाना है कि युद्ध तभी जीते जा सकते हैं जब देश मानसिक और नैतिक रूप से इसकी तैयारी करता है। इतिहास हमें सिखाता है कि अस्थायी विजय का यदि सही प्रयोग न किया तो बर्बाद हो जाती हैं, जैसे 1971 की विजय। कल्पना कीजिए कि यदि इंदिरा गांधी ने 1972 में भुट्टो को पाकिस्तान-अधिगृहित कश्मीर छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया होता तो आज स्थिति क्या होती?

आज के भारत को पाकिस्तान और चीन दोनों के खिलाफ रणनीतिक योजना बनानी होगी। मोदी का दृष्टिकोण स्पष्ट करता है कि सैन्य बढ़त को बनाए रखना अपरिहार्य है। यदि फिर से मौका आता है, तो भारत को साहसिक कदम उठाने चाहिए—चाहे वह PoK को फिर से कब्जाने का हो या बांग्लादेश को उसकी कमजोर सिलिगुड़ी गलियारे को काटकर अलग करने का। बिना स्पष्ट जीत के, ऐसे लंबे संघर्ष को निर्णायक ढंग से सुलझाने का अकेला यही तरीका है। ऐसे विश्व में जहां भारत का शत्रु उसकी मंशा को नहीं छुपाते तो अस्पष्टता एक बोझ बनती है। पाकिस्तान चीन जैसा नहीं है—यह अपने पंजों को छुपाता नहीं है। यह उन्हें फैला कर चलता है। यह अस्थिरता पर पलता है, और उसके सैन्य और मौलवी और जिहादी आतंकियों को अपने भागीदार समझता है। ऐसे विरोधी के विरुद्ध, मोदी की रणनीति उस रणनीतिक भूल को सुधारती है जो दशकों तक मध्य मार्ग (मध्यम मार्ग वाली) पर निर्भर रही थी। यह समय है कि भारत का राजनीतिक वर्ग इस युद्ध की सच्चाई को समझे, जो कि सिर्फ छोटी-मोटी झड़पें भर नहीं है।

यह एक सभ्यतागत युद्ध है। और यह तभी खत्म होगा जब एक पक्ष पूरी तरह से टूट जाएगा। पाकिस्तान अपने क्षेत्र युद्ध के जश्न मना रहा है, जबकि आर्थिक धरातल और आंतरिक टकराव में डूबा है, तो भारत को एक अटूट रणनीतिक लाभ हासिल करना चाहिए। संदेश अब सरल है और सभी को स्पष्ट सुनाना चाहिए: यह नया भारत है। उकसावे अब बर्दाश्त नहीं की जाएंगी बल्कि उनका सख्त जवाब दिया जाएगा।

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