जमाने वालों….देखो तो जरा….
बे-इंतहा नियामतें बक्शी हैं…..!
परवरदीगार ने उनको प्यारे
झूठ को जिसने भी…
अपने पास कर लिया है….
यहाँ खुशनसीबी के दौर में…
जी रहा है झूठ….और…
जमाने वालों ने इसकी अदा पर
भरपूर विश्वास कर लिया है….
प्रतिस्पर्धा और विकास के मद्देनजर
झूठ ने तरक्की कर अपने को…..
एडवांस कर लिया है….
निखारा है खुद को….
बड़े करीने से इसने….और….
सच मानो कि समाज में अब….
अपना स्थान खास कर लिया है…
गाँव-देश-समाज में बेकदरी बढ़ी है
कुछ इस हद तक…ईमान-धरम की
कि सबने ही अपने विकास के लिए
अब झूठ से ही….आस कर लिया है
विचार करता है कौन यहाँ….?
क्या है सही और गलत क्या है प्यारे
आदमी की जात ही है अलग सी…!
इसके लिए खुद अपने से ही,
उसने टॉस कर लिया है….
तमाशबीन हो गए हैं यहाँ….!
सच बोलने वाले…सारे के सारे….
क्योंकि सबको ही झूठ ने…
अपना दास कर लिया है….
झूठ को बनाया ढाल जिसने…
फल मीठा ही दिखा….!
उसको हर एक डाल का….
फिक्र ही रही कहाँ उसको…
पुण्य और पाप का….
उसने तो भला सोचा….
बस खुद अपने आप का….
भले लोग समझाते रहे उसको,
कि रिश्ता झूठ से रखकर उसने….
झूठ को गले का फाँस कर लिया है
झूठ….जो पहले तो रहा….!
हर ओर….विषय हास का…
विकास के इस नए दौर में…
बस यही दिखता है…
अँधेरे में….किरण प्रकाश का….
सच मानो तो….यहाँ मान लिया है..
लोग-बाग ने….शायद यही…
कि झूठ की दुनिया का….!
एक अलग ही सुखद अहसास है…
जिसने रखा करीब का नाता झूठ से
उसने ऑटोमैटिकली….!
सुखों का आभास कर लिया है…..
सुखों का आभास कर लिया है….
रचनाकार….
जितेन्द्र कुमार दुबे
अपर पुलिस उपायुक्त,लखनऊ
