दिल्ली में एक बार फिर वही सवाल उठ खड़ा हुआ है – क्या तिरंगा लेकर शांतिपूर्ण विरोध करना अब अपराध बन गया है?
बुधवार को स्पेशल एग्जीक्यूटिव मैजिस्ट्रेट कोर्ट ने कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के दो प्रमुख चेहरे सौरव दास और आशुतोष रांका को पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया। दोनों को तिहाड़ जेल भेज दिया गया। तीसरे साथी अजिंक्य शिंदे को पर्सनल बॉन्ड पर छोड़ दिया गया।
पुलिस का आरोप है कि 13 अक्टूबर की सुबह ये नेता और उनके 11 साथी बैरिकेड पार करके जंतर मंतर में घुस गए, जो अब आधिकारिक प्रदर्शन स्थल नहीं रह गया है। उन्होंने तिरंगा लहराया और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे के नारे लगाए। पुलिस ने उन्हें ट्रेस्पासिंग, पीस बॉन्ड तोड़ने और सरकारी काम में बाधा डालने के आरोप में हिरासत में लिया।
सौरव और आशुतोष ने 10 अक्टूबर को एयरपोर्ट पर हिरासत के बाद एक साल तक शांति बनाए रखने का बॉन्ड साइन किया था। पुलिस का कहना है कि उन्होंने दोबारा कानून तोड़ा।
राहुल गांधी का पहला खुला समर्थन
इसी घटना पर राहुल गांधी ने पहली बार सीजेपी का खुलकर समर्थन किया। उन्होंने लिखा –
“जंतर मंतर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन में तिरंगा लहराना कोई अपराध नहीं है। युवाओं को इसके लिए जेल भेजना कायरता है। छात्र, युवा, पत्रकार, इंडिया ब्लॉक – अलग-अलग बैनर, एक ही मकसद। सारे प्रदर्शन एक हैं – नागरिक अपने संवैधानिक अधिकार मांग रहे हैं। जंतर मंतर भारत के लोगों का है। हम इसे वापस लेंगे।”
ये बयान सिर्फ एक राजनीतिक समर्थन नहीं है। ये उस माहौल का आईना है जहां विरोध की जगह लगातार सिकुड़ रही है।
क्या है असली सवाल?
जंतर मंतर को प्रदर्शतन स्थल से हटा दिया गया। फिर भी युवा तिरंगा लेकर वहां पहुंचे। उनकी मांग वही है जो पिछले कई दिनों से उठ रही है – ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा और चुनावी प्रक्रिया में कथित गड़बड़ी पर जवाबदेही।
जब कोई तिरंगा लेकर शांतिपूर्ण विरोध करे और उसे जेल भेज दिया जाए, तो सवाल उठता है कि विरोध का अधिकार कहां बचा है। सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने साफ कहा –
“आशु और सौरव की गलती क्या थी? जंतर मंतर पर तिरंगा लहराना।”
युवाओं की आवाज को दबाने की कोशिश?
पिछले कुछ दिनों में दिल्ली में हजारों युवा हिरासत में लिए गए। लीडर्स को प्लेन से उठाया गया। अब जंतर मंतर से तिरंगा लहराने पर जेल। ये सब मिलकर एक तस्वीर बनाते हैं – जहां व्यवस्था हर कीमत पर युवाओं की आवाज को रोकने की कोशिश कर रही है।
राहुल गांधी का बयान इसी तस्वीर को और साफ कर रहा है। उन्होंने कहा कि अलग-अलग बैनर हो सकते हैं, लेकिन मकसद एक है – संवैधानिक अधिकार।
जब तिरंगा लहराना अपराध बन जाए, तो लोकतंत्र के लिए ये खतरे की घंटी है। सौरव दास और आशुतोष रांका आज तिहाड़ में हैं। लेकिन उनके साथ जो सवाल उठे हैं, वो जेल की दीवारों के बाहर भी गूंज रहे हैं।
जंतर मंतर भारत के लोगों का है – ये सिर्फ एक नारा नहीं, अब एक वादा बन चुका है।

