दिल्ली हाईकोर्ट ने ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की अध्यक्ष नेहा बोरा की याचिका को आज (21 अक्टूबर 2026) urgent basis पर सुनने की सहमति दे दी है। याचिका में स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट (SEM) द्वारा जारी उस नोटिस को चुनौती दी गई है, जिसमें उनसे ₹10,000 का पर्सनल बॉन्ड भरकर जांच के दौरान शांति बनाए रखने को कहा गया था।
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, केस को आज urgent listing के लिए मेंशन किया गया और कोर्ट ने अनुरोध स्वीकार कर लिया। हाईकोर्ट इस समय दशहरा अवकाश पर है और सामान्य रूप से 26 अक्टूबर को खुलना था, लेकिन urgent सुनवाई की अनुमति मिल गई है।
नोटिस क्या था?
17 अक्टूबर को न्यू दिल्ली डिस्ट्रिक्ट के स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट ने नेहा बोरा को नोटिस जारी किया था। इसमें भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 126, 130 और 135(3) का जिक्र करते हुए उन्हें 19 अक्टूबर को पेश होने और ₹10,000 का बॉन्ड (एक जमानतदार के साथ) भरने को कहा गया था। नोटिस में कहा गया था कि जांच के दौरान शांति बनाए रखने के लिए यह जरूरी है।
पुलिस का आरोप है कि नेहा बोरा 16 अक्टूबर को मंडी हाउस के आसपास नारेबाजी कर रही थीं, जंतर मंतर के पास निषेधाज्ञा के बावजूद विरोध प्रदर्शनों में शामिल रहीं, और कनॉट प्लेस में प्रदर्शन के लिए लोगों को उकसाया।
नेहा बोरा का पक्ष
अपनी याचिका में नेहा बोरा ने कहा है कि नोटिस अस्पष्ट, तथ्यात्मक रूप से गलत और असंवैधानिक है। इसमें शांति भंग होने की “संभावना” को साबित करने वाला कोई ठोस सबूत या सामग्री नहीं दी गई है। न तो समय, न अवसर और न ही घटना का स्पष्ट जिक्र है, जिससे शांति भंग का खतरा बताया जा रहा है।
उन्होंने आरोप लगाया है कि पुलिस का यह कदम शांतिपूर्ण असहमति को दबाने का प्रयास है। याचिका में अनुच्छेद 19 (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का हवाला दिया गया है।
नेहा बोरा को 16 अक्टूबर को कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के ‘लेहरा दो तिरंगा’ मार्च में शामिल होने के दौरान प्रिवेंटिव डिटेंशन में लिया गया था। वे मंडी हाउस से हिरासत में ली गईं और अगले दिन रिहा हुईं। AISA का आरोप है कि रिहाई के बाद सादे कपड़ों में पुलिसकर्मी उनका पीछा भी कर रहे थे।
पृष्ठभूमि
यह मामला हाल के हफ्तों में चुनाव आयोग की स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर चल रहे प्रदर्शनों से जुड़ा है। CJP और छात्र संगठनों ने जंतर मंतर और कनॉट प्लेस में प्रदर्शन किए थे। कई नेताओं और कार्यकर्ताओं को प्रिवेंटिव हिरासत में लिया गया।
CJP संस्थापक अभिजीत दीपके को भी उसी दौरान हिरासत में लिया गया था। उन्हें SEM के सामने पेश किया गया और शांति बॉन्ड भरने के बाद रिहा किया गया।
कानूनी प्रावधान
BNSS की धारा 126 के तहत स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट को अधिकार है कि अगर उसे विश्वसनीय जानकारी मिले कि कोई व्यक्ति शांति भंग कर सकता है, सार्वजनिक शांति बिगाड़ सकता है या गलत कार्य कर सकता है, तो वह उससे बॉन्ड भरवा सकता है। लेकिन कोर्ट में अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि ऐसे प्रावधानों का इस्तेमाल मनमाने तरीके से नहीं होना चाहिए और पर्याप्त आधार होना चाहिए।
अब आगे क्या?
हाईकोर्ट आज इस याचिका पर सुनवाई करेगा। नेहा बोरा की कानूनी टीम (जिसमें एडवोकेट अभिक चिम्नी और प्रणजल अब्रॉल शामिल हैं) ने नोटिस पर स्टे और इसे रद्द करने की मांग की है। साथ ही पुलिस को कोई जबरदस्ती कार्रवाई न करने का निर्देश भी मांगा गया है।
यह मामला छात्र नेताओं और प्रदर्शनकारियों पर प्रिवेंटिव कार्रवाई के इस्तेमाल पर कानूनी बहस को फिर से सामने लाता है। हाईकोर्ट का रुख इस बात पर निर्भर करेगा कि पुलिस के पास शांति भंग की आशंका के ठोस सबूत हैं या नहीं।
अभी सुनवाई का इंतजार है।
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