लद्दाख के पर्यावरण कार्यकर्ता और आंदोलन के प्रमुख चेहरे सोनम वांगचुक ने एक बार फिर केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने आरोप लगाया है कि केंद्र मई 2026 में लद्दाख के प्रतिनिधियों के साथ हुई सहमति से पीछे हट गया है। दिल्ली में गुरुवार को आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने साफ कहा कि विधानसभा वाले केंद्र शासित प्रदेश और संवैधानिक सुरक्षा उपायों से कम कुछ भी लद्दाख के लोगों को मंजूर नहीं होगा।
क्या कहा सोनम वांगचुक ने?
दिल्ली में प्रेस वार्ता करते हुए सोनम वांगचुक ने कहा कि 22 मई को गृह मंत्रालय की उपसमिति और लेह एपेक्स बॉडी (LAB) तथा कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (KDA) के बीच हुई बैठक में महत्वपूर्ण सहमति बनी थी। उस बैठक में लद्दाख को विधानसभा वाला केंद्र शासित प्रदेश बनाने और अनुच्छेद 371 के तहत सुरक्षा उपाय देने पर सहमति जताई गई थी।
उन्होंने बताया कि शुरू में लद्दाख के प्रतिनिधियों ने पूर्ण राज्य का दर्जा मांगा था। लेकिन जब केंद्र ने संसाधनों की कमी का हवाला दिया, तो उन्होंने विधानसभा वाले यूटी और संवैधानिक सुरक्षा का प्रस्ताव रखा। वांगचुक के मुताबिक, उस समय केंद्र ने इसे सैद्धांतिक रूप से स्वीकार किया था।
अब केंद्र सिर्फ काउंसिल जैसी संस्था का प्रस्ताव दे रहा है, जिसमें वास्तविक शक्तियां नहीं हैं। उन्होंने इसे “विश्वासघात” करार दिया।
22 अक्टूबर की बैठक क्यों नहीं हुई?
15 अक्टूबर को लेह में दोनों पक्षों ने अपने ड्राफ्ट प्रस्तावों का आदान-प्रदान किया था। इसके बाद 22 अक्टूबर को दिल्ली में अगली बैठक तय हुई थी। सोनम वांगचुक ने बताया कि उन्होंने टिकट बुक कर ली थी और तैयारी के साथ दिल्ली आए थे। लेकिन अचानक बैठक रद्द कर दी गई।
उन्होंने कहा, “मैंने टिकट बुक कर ली थी। हमने अपनी योजना के मुताबिक तैयारी की थी, लेकिन अब कहा जा रहा है कि बैठक नहीं हो रही। ये एक और विश्वासघात है।”
चीन का दबाव और लद्दाख की स्थिति
सोनम वांगचुक ने लद्दाख की सामरिक स्थिति का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि एक तरफ चीन लद्दाख पर दावा कर रहा है, दूसरी तरफ अपनी ही सरकार लद्दाखियों को अलग-थलग कर रही है। उन्होंने पूछा कि जब अरुणाचल प्रदेश जैसे संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्र को 1987 में राज्य का दर्जा दिया जा सकता था, तो लद्दाख को विधानसभा क्यों नहीं दी जा सकती?
उन्होंने उपराज्यपाल की शक्तियों पर भी सवाल उठाया। उनका आरोप है कि एलजी को ब्रिटिश वायसराय की तरह असीमित अधिकार दिए गए हैं और स्थानीय निकायों के अधिकार कम किए जा रहे हैं।
मांग क्या है?
सोनम वांगचुक ने दोहराया कि लद्दाख के लोग विधानसभा वाले केंद्र शासित प्रदेश और अनुच्छेद 371 के तहत सुरक्षा उपायों से कम कुछ भी स्वीकार नहीं करेंगे। उन्होंने कहा कि अगर केंद्र सहयोग करे तो लद्दाख पूर्ण राज्य भी बन सकता है, जिससे चीन को जवाब दिया जा सके।
उन्होंने चेतावनी दी कि सीमावर्ती क्षेत्र को कमजोर करने से देश को नुकसान होगा। लद्दाख के लोग हमेशा देश के साथ खड़े रहे हैं, लेकिन अब उन्हें लगता है कि उनकी बात नहीं सुनी जा रही।
बातचीत का सफर
मई 2026 की बैठक के बाद लद्दाख में उम्मीद जगी थी कि लोकतांत्रिक व्यवस्था बहाल होगी। लेकिन 15 अक्टूबर की बैठक में दोनों पक्षों के प्रस्तावों में बड़ा अंतर दिखा। LAB और KDA ने केंद्र के 32 पेज के ड्राफ्ट को खारिज कर दिया। उनका कहना है कि प्रस्तावित निकाय मौजूदा हिल काउंसिल जैसा ही है, जिसमें वास्तविक शक्तियां नहीं हैं।
अब जब 22 अक्टूबर की बैठक भी रद्द हो गई, तो लद्दाख के प्रतिनिधियों में निराशा बढ़ गई है। सोनम वांगचुक का कहना है कि केंद्र एकतरफा फैसले ले रहा है और स्थानीय आकांक्षाओं को नजरअंदाज कर रहा है।
राजनीतिक और सामरिक महत्व
लद्दाख का मुद्दा सिर्फ प्रशासनिक नहीं, बल्कि सामरिक भी है। चीन के साथ सीमा विवाद के बीच क्षेत्र के लोगों का विश्वास बनाए रखना जरूरी माना जाता है। सोनम वांगचुक का आरोप है कि केंद्र अपनी जिद की वजह से सीमा को कमजोर कर रहा है।
उन्होंने कहा कि लद्दाख आदिवासी क्षेत्र है और लोग अपने अधिकारों के लिए संयुक्त राष्ट्र तक जाने को तैयार हैं। लेकिन उनका मुख्य संदेश साफ है — लोकतंत्र और स्थानीय भागीदारी बिना किसी समझौते के चाहिए।
इस बीच केंद्र सरकार की तरफ से अभी कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। लद्दाख प्रशासन ने पहले साफ कहा था कि राज्य का दर्जा या विधानसभा वाला यूटी एजेंडे में नहीं है।
सोनम वांगचुक का यह बयान लद्दाख आंदोलन को एक बार फिर राष्ट्रीय चर्चा में ला दिया है। अब देखना होगा कि केंद्र इस आरोप पर क्या रुख अपनाता है और बातचीत का अगला दौर कब शुरू होता है।
संबंधित बाहरी स्रोत
The Indian Express: लद्दाख वार्ता और केंद्र पर सोनम वांगचुक के आरोप
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