जौनपुर। शाहगंज के पूर्व विधायक और समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता शैलेंद्र यादव ललई यादव की एक तस्वीर इन दिनों चर्चा में है। तस्वीर में वे जालीदार टोपी पहनकर उर्स के जुलूस में शामिल होते दिख रहे हैं। इस तस्वीर के बाद उनके राजनीतिक रुख को लेकर क्षेत्र में बहस तेज हो गई है।
आलोचकों का कहना है कि शैलेंद्र यादव लगभग 20 वर्षों तक विधायक और दो बार मंत्री रहे हैं। वे स्वयं यादव समाज से आते हैं, जिसे भगवान कृष्ण का वंशज माना जाता है। इसके बावजूद स्थानीय लोगों का एक वर्ग सवाल उठा रहा है कि वे कृष्ण जन्माष्टमी, दुर्गा पूजा, रामलीला और हनुमान जयंती जैसे हिंदू धार्मिक आयोजनों में सक्रिय रूप से शामिल होते क्यों नहीं दिखे, जबकि उर्स जैसे कार्यक्रम में उनकी मौजूदगी प्रमुखता से दिखी।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह समाजवादी पार्टी की PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक रणनीति का हिस्सा है। सपा ने खुलकर कहा है कि वह इसी समीकरण पर 2027 का चुनाव लड़ेगी। ऐसे में ब्राह्मण और क्षत्रिय समाज खुद को इस एजेंडे से दूर महसूस कर रहा है। सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या दलित और पिछड़े हिंदू नहीं हैं? निषाद समाज जो भगवान राम के मित्र निषाद राज गुहा के वंशज माने जाते हैं, वर्मा, राजभर, धोबी, पासी, मुसहर जैसे दलित-पिछड़े वर्गों और स्वयं यदुवंशी समाज की धार्मिक भावनाओं का क्या?
स्थानीय लोगों में यह चर्चा है कि 20 प्रतिशत वोट के लिए टोपी पहनना क्या 80 प्रतिशत हिंदू आबादी की उपेक्षा है? क्या इससे भगवान कृष्ण के वंशज यादव बिरादरी सहित धर्म में आस्था रखने वाले पिछड़े-दलित वर्ग आहत नहीं होंगे?
भाजपा समर्थक वर्ग इसे तुष्टिकरण बता रहा है और कह रहा है कि जनता सब देख रही है। उनका नारा है – “हम बंटेंगे तो कटेंगे”। 2027 का चुनाव नजदीक है और जनता दिखावे को नहीं, आचरण को देखेगी।
संवैधानिक दृष्टि से हर नेता को सभी धर्मों के कार्यक्रमों में जाने का अधिकार है, यह धर्मनिरपेक्षता है। लेकिन सवाल नीयत और संतुलन का है। यदि एक धर्म के उत्सव से दूरी और दूसरे के आयोजन में सक्रियता दिखेगी, तो वोटर इसे राजनीतिक संदेश के रूप में ही देखेगा।


