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क्रॉस वोटिंग के डर और 2027 के चुनाव की चाल… अखिलेश ने क्यों छोड़ दिया तीसरा उम्मीदवार उतारने का विचार?

Digital Desk - Lucknow
Last updated: October 7, 2026 4:49 pm
Digital Desk - Lucknow
57 minutes ago
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अखिलेश
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लखनऊ: उत्तर प्रदेश की 10 राज्यसभा सीटों के लिए होने वाले द्विवार्षिक चुनावों का राजनीतिक समीकरण अब पूरी तरह साफ हो गया है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने अपने 8 उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं, जबकि समाजवादी पार्टी (SP) ने केवल 2 उम्मीदवार ही उतारे हैं। पहले राजनीतिक गलियारों में इस बात की जोरदार चर्चा थी कि सपा तीसरा उम्मीदवार भी उतारकर मुकाबला कड़ा करेगी, लेकिन पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव के हालिया रुख से यह साफ हो गया कि पार्टी ने इस रेस से पीछे हटना ही बेहतर समझा। राजनीतिक विश्लेषक इसे पार्टी के भीतर की आंतरिक दरारों को रोकने, संभावित फजीहत से बचने और साल 2027 के बड़े रण से पहले एक बड़ा रणनीतिक कदम मान रहे हैं।

Contents
चुनावी गणित: 37 वोटों का जादुई कोटाफरवरी 2024 के कड़वे अनुभव से सबक2027 के विधानसभा चुनाव पर सीधी नजर

चुनावी गणित: 37 वोटों का जादुई कोटा

उत्तर प्रदेश विधानसभा का वर्तमान अंकगणित देखें तो कुल 396 विधायक हैं और 10 सीटें भरी जानी हैं। राज्यसभा चुनाव की सिंगल ट्रांसफरेबल वोट प्रणाली के तहत एक सीट जीतने के लिए आवश्यक प्रथम-वरीयता वोटों का फार्मूला [कुल विधायक ÷ (चुनाव के लिए सीटें + 1)] + 1 होता है। इस हिसाब से 396 ÷ 11 = 36, और उसमें 1 जोड़ने पर एक सीट जीतने के लिए 37 वोटों की आवश्यकता होती है।

यदि समीकरणों की बात करें तो सपा और कांग्रेस गठबंधन के पास कुल 103 विधायक हैं (जिसमें से एक विधायक रामाकांत यादव के जेल में होने के कारण वोट नहीं डाल पाएंगे)। वहीं, एनडीए खेमे में बीजेपी और उसके सहयोगियों के पास भारी बहुमत है, लेकिन सपा के भीतर कुछ विधायकों के रुख को लेकर लंबे समय से संशय बना हुआ था।

फरवरी 2024 के कड़वे अनुभव से सबक

इस रणनीतिक पीछे हटने के पीछे सबसे बड़ा कारण फरवरी 2024 के राज्यसभा चुनावों का कड़वा अनुभव है। तब संख्याबल के आधार पर सपा के तीन उम्मीदवार आसानी से जीत सकते थे, लेकिन बीजेपी ने आश्चर्यजनक रूप से आठवां उम्मीदवार उतारकर मुकाबला फंसा दिया था। उस दौरान सपा के करीब 7 विधायकों ने पाला बदलकर क्रॉस-वोटिंग कर दी थी, जिससे पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा था।

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इस बार भी सपा विधायक पूजा पाल ने खुले तौर पर बीजेपी के समर्थन का ऐलान किया है, जबकि अभय सिंह, राकेश प्रताप सिंह, मनोज कुमार पांडे, राकेश पांडे, विनोद चतुर्वेदी और आशुतोष मौर्य जैसे नेताओं का झुकाव भी एनडीए की तरफ माना जा रहा है। यदि सपा तीसरा उम्मीदवार उतारती, तो पार्टी के भीतर का यह असंतोष और क्रॉस-वोटिंग का खतरा खुलकर सतह पर आ जाता, जिससे कार्यकर्ताओं का मनोबल टूट सकता था।

यह भी पढ़ें: 3 नहीं 403 पर अखिलेश की नजर! राज्यसभा से पीछे हटकर 2027 के लिए BJP को चुनौती देने की तैयारी?

2027 के विधानसभा चुनाव पर सीधी नजर

सबसे अहम बात यह है कि उत्तर प्रदेश में अगले साल यानी 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में यदि राज्यसभा चुनाव में सपा के खेमे में सेंधमारी होती, तो इसका सीधा असर पार्टी की छवि पर पड़ता और सहयोगी दलों (जैसे कांग्रेस) के साथ आगामी सीट-बंटवारे की वार्ताओं में सपा को बैकफुट पर आना पड़ता।

तीसरी उम्मीदवारी से दूरी बनाकर सपा ने न केवल एक संभावित अपमानजनक हार और आंतरिक विभाजन को टाला है, बल्कि संगठनात्मक स्थिरता को प्राथमिकता दी है। अतिरिक्त सीट के लिए अनिश्चित लड़ाई में उलझने के बजाय व्यावहारिक आकलन को चुनकर सपा ने यह साबित कर दिया है कि पार्टी फिलहाल अपनी एकजुटता बचाए रखते हुए 2027 के मुख्य रण पर पूरा फोकस करना चाहती है।

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