कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ जिले के गोकर्ण में रामतीर्थ पहाड़ियों की एक सुदूर गुफा में 40 वर्षीय रूसी महिला नीना कुटिना अपनी दो नाबालिग बेटियों, छह वर्षीय प्रेमा और चार वर्षीय आमा, के साथ रह रही थी। स्थानीय लोग नीना को मोही के नाम से भी जानते हैं। यह खुलासा 9 जुलाई 2025 को गोकर्ण पुलिस की नियमित गश्त के दौरान हुआ, जब सर्कल इंस्पेक्टर श्रीधर एस.आर. और उनकी टीम ने भूस्खलन-प्रवण क्षेत्र में कपड़े सूखते देखे। जांच करने पर उन्हें गुफा में नीना और उनकी बेटियां मिलीं, जो लगभग दो सप्ताह से वहां रह रही थीं। नीना ने बताया कि वह हिंदू दर्शन और भारतीय आध्यात्मिक परंपराओं से प्रेरित होकर गोवा से गोकर्ण आई थी। उसने ध्यान और पूजा के लिए इस गुफा को चुना था। गुफा में भगवान राम की एक मूर्ति और रूसी किताबें मिलीं, जो उनके आध्यात्मिक झुकाव को दर्शाती हैं। पुलिस ने पाया कि नीना का बिजनेस वीजा 2017 में समाप्त हो चुका था, और उनकी बेटियां भारत में ही जन्मी थीं।
नीना ने दावा किया कि वह प्रकृति के बीच शांति और एकांत की तलाश में थी। जंगल में रहना उनकी आध्यात्मिक साधना का हिस्सा था। गुफा में उनके पास केवल प्लास्टिक शीट्स और इंस्टेंट नूडल्स थे, जो उनकी न्यूनतम जीवनशैली को दर्शाता है। हालांकि, यह क्षेत्र भूस्खलन और जहरीले सांपों के लिए खतरनाक है, जिसके चलते पुलिस ने उनकी सुरक्षा को प्राथमिकता दी। नीना और उनकी बेटियों को कुमता तालुक के बंकीकोडला गांव में स्वामी योगरत्न सरस्वती के आश्रम में अस्थायी रूप से स्थानांतरित किया गया। पुलिस ने नीना का पासपोर्ट और वीजा बरामद किया, जिससे पता चला कि वह 2017 से बिना वैध वीजा के भारत में रह रही थी। उनकी बेटियों के पिता के बारे में पूछताछ पर नीना ने जानकारी देने से इनकार कर दिया, जिससे जांच जटिल हो गई है।
पुलिस अब नीना और उनकी बेटियों को रूस वापस भेजने की प्रक्रिया शुरू करने की योजना बना रही है। उनकी बेटियों का भारत में जन्म और बिना उचित दस्तावेजीकरण के रहना उनके कानूनी स्थिति पर सवाल उठाता है। इस मामले ने स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक चर्चा छेड़ दी है। कई लोग यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या नीना की हरकतें आध्यात्मिक भक्ति से प्रेरित थीं या यह कानूनी परिणामों से बचने की कोशिश थी। कर्नाटक पुलिस ने बेंगलुरु में विदेशी क्षेत्रीय पंजीकरण कार्यालय से संपर्क किया है ताकि निर्वासन प्रक्रिया शुरू की जा सके। नीना को अपनी वापसी का खर्च स्वयं वहन करना पड़ सकता है। यह असामान्य मामला न केवल अधिकारियों को चौंका रहा है, बल्कि भारत में आध्यात्मिक पर्यटन और आप्रवासन नियमों की जटिलताओं को भी उजागर करता है।

