–शिवपूजन पांडे, वरिष्ठ पत्रकार
वीरों और संतों की भूमि कहे जाने वाले महाराष्ट्र में रहने के लिए इन दिनों एक गुप्त परंतु प्रभावी स्लोगन को याद रखना अनिवार्य हो गया है। पिछले कुछ दिनों में जिस तरह से मुंबई और आसपास के शहरों में भाषा को लेकर छिटपुट घटनाएं देखने को मिल रही हैं, उससे साफ जाहिर है कि महाराष्ट्र में रहने के लिए गैर मराठियों को अब मराठी भाषा से कहीं ज्यादा मनसे की जय बोलना आवश्यक हो गया है। हम यह क्यों भूलते हैं कि लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के जिस नारे“स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और हम इसे प्राप्त करके ही रहेंगे” ने पूरे देश को अंग्रेजों के खिलाफ एकजुट कर दिया था, उन्हीं तिलक की धरती पर भाषा के नाम पर नफरत और अलगाव के बीज बोए जा रहे हैं। हिंदवी स्वराज की स्थापना करने वाले छत्रपति शिवाजी महाराज की धरती पर हिंदुओं में ही विभाजन रेखा खींची जा रही है। भारत रत्न डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर के संविधान का ही पालन नहीं किया जा रहा है। भारत ही नहीं अपितु पूरी दुनिया में अध्यात्म और सनातन की खुशबू बिखेरनेवाले संत तुकाराम,संत रामदास, संत एकनाथ , संत ज्ञानेश्वर के संदेशों का कितना पालन हो रहा है? आखिर हम किस दिशा की तरफ जा रहे हैं? एक भारत, श्रेष्ठ भारत की तरफ अथवा एक ऐसे भारत की तरफ जहां नफरत की कलम से मानवीय मूल्यों को नकारा जा रहा हो। कहने के लिए महाराष्ट्र में इस समय हिंदूवादी सरकार है परंतु सबसे अधिक हिंदुओं को ही टारगेट किया जा रहा है। हमें अपनी मातृ भूमि के साथ-साथ अपनी मातृभाषा पर भी गर्व होना चाहिए। यह बात सब पर लागू होती है। सबको अपनी अपनी मातृभाषा में बात करने का संवैधानिक अधिकार भी प्राप्त है। देखा जाए तो इस पूरे प्रकरण में सबसे अधिक नुकसान शिवसेना यूबीटी को हुआ है। जिस पार्टी को मुंबई महानगरपालिका के चुनाव में सबसे अधिक मजबूत माना जा रहा था, वह आज घुटने पर दिखाई दे रही है। करीब करीब सभी प्रांतों के लोगों को लगता था कि मुंबई महानगरपालिका में शिवसेना यूबीटी का रहना आवश्यक है। जनता के बीच उसकी अच्छी छवि देखी जा रही थी। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, कांग्रेस पार्टी और शिवसेना यूबीटी का गठबंधन पूरी तरह से भारी दिखाई दे रहा था। परंतु दोनों भाइयों के एक प्लेटफार्म पर आ जाने से शिवसेना यूबीटी को भारी नुकसान का सामना करना पड़ सकता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि महानगरपालिका के स्कूलों में आए बदलाव का पूरा श्रेय आदित्य ठाकरे को जाता है। अलबत्ता इस प्रकरण के बाद शिवसेना शिंदे गट को जोरदार लाभ पहुंचा है। उसका प्रभाव जमीनी स्तर पर दिखाई भी देने लगा है। आने वाले दिनों में इस पार्टी में प्रवेश करने वाले गैर मराठी नेताओं की संख्या बढ़नी तय मानी जा रही है। भाजपा की तरफ तेजी से होने वाला प्रवाह अब ठंडा पड़ता दिखाई दे रहा है। राजनीतिक सूत्रों की माने तो यह पूरा प्रकरण सांठ गांठ का है। फायदा लेने वालों ने फायदा ले लिया और भावना में बहने वाले लोगों ने नुकसान उठा लिया।

