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Akhand Rashtra News > साहित्य > माटी में लोट-लोटकर…..!
साहित्य

माटी में लोट-लोटकर…..!

Digital Desk - Lucknow
Last updated: March 29, 2026 8:49 pm
Digital Desk - Lucknow
3 hours ago
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jitendra kumar dubey
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रोक थी पहले कभी…..!
समंदर पार करने की….
भृकुटि लाल हो जाती सभी की,
ऐसी बात और हरकतों पर….
दिन बिसार दिए गए वे अब….
पूछता है हर कोई यही….!
कि तुम समुंदर पार करोगे कब….
बस अर्थ की चिंता….!
सताती है यहाँ सभी को…
प्रेम की भाषा सुनो,
नहीं सुहाती है किसी को…
समंदर पार की गाथा….!
सुहाती है….हर किसी को…
हर आस पूरी होगी वहीं,
बात यही रास आती है
अब गाँव-देश में हर किसी को…
सुना है कि निकाले गए थे….!
सब रतन समंदर को मथकर….
जाने क्यों सबको लगता है ऐसा….
कि छिटके हुए हैं रतन…सब यही…
दूरजाकर…कहीं उस पार समंदर…
शायद….मेरे भारत को छोड़कर…
मैंने भी….मशहूर होने और….
कुछ रतन….पाने की जिद में….
बहुत मन से समंदर पार किया…
इसी बहाने से….!
खुद अपना और अपनों का…
सपना साकार किया….पर…
समझ में देर से आया मेरे मित्रों
कि….माँ-बाप और गाँव-देश पर…!
मैंने तो अत्याचार किया…क्योंकि…
जो बखान करते थे लोग….!
समंदर पार की शुद्ध हवा-पानी का
उसमें अभाव ही अभाव है….
बचपन की नादानी और शैतानी का
मैंने नज़दीक से देखा यहाँ कि….!
हैं बूढ़े बहुत ढेर सारे यहाँ….पर….
हर ओर अकाल पड़ा है….
बच्चों के लिए परियों की कहानी का
सचमुच कुछ अलग और अजीब सी
जिंदगी जी रहा हूँ मै यहाँ प्यारे…!
ज़िद में अपने समंदर पारकर….
कुंठित हो गया हूँ मैं…..यहाँ मित्रों…
अपने बचपन के यारों को छोड़कर..
एक मशीन सा हो गया हूँ…..!
यहाँ अनजानों के बीच रह-रह कर
दिन-रात तो बहुत दूर है….!
मुश्किल हो गया है,
काटना यहाँ पल भर….
मन भर गया है खूब मेरा,
यहाँ पार समंदर में रह-रहकर…
इसीलिए कहता हूँ मैं प्यारे….!
फिर पारकर समंदर….!
वापस जरूर आऊँगा मैं….
अपनी माटी, गाँव-देश के अन्दर…
क्योंकि मुझे आज भी पसन्द है…
जीना….अपने गाँव-देश की,
माटी में लोट-लोटकर….
जीना….अपने गाँव-देश की,
माटी में लोट-लोटकर….

रचनाकार…..
जितेन्द्र कुमार दुबे
अपर पुलिस उपायुक्त, लखनऊ

समरथ को नहिं दोष गुसाईं….!
केहू से कहलो न जाय…..!
कविता : उस्ताद मिला मुझे
आपदाओं से लड़ने की प्रेरणा थे बाबा, कितने प्यारे थे तुम
गाँव-गाँव, शहर-शहर. गली-गली और डगर-डगर. मैं ढूँढता हूँ अक्सर…!
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