- डॉ. मंगलेश्वर त्रिपाठी
Maharashtra की सियासत में एकनाथ शिंदे अब ‘गद्दारी’ का पर्याय नहीं, ‘राजनीतिक डकैती’ का चेहरा बन चुके हैं। जिस शिवसेना ने ऑटो चालक से मुख्यमंत्री बनाया, उसी की पार्टी, चुनाव चिन्ह ‘तीर-कमान’ और अब सांसद तक लूट लिए। कहानी शुरू होती है ठाणे के वागले स्टेट से। आर्थिक तंगी के कारण 11वीं के बाद पढ़ाई छोड़कर किराए की खोली में रहने वाला एक ऑटो चालक। नाम – एकनाथ शिंदे। दिवंगत आनंद दिघे ने इस नौजवान पर भरोसा किया। ठाकरे परिवार के सबसे विश्वासपात्र दिघे ने शिंदे को दो बार नगरसेवक बनाया, नगर पालिका में विपक्ष का नेता बनाया। दिघे के निधन के बाद उद्धव ठाकरे ने शिंदे को बेटे की तरह पाला। 2004 में बाला साहब से सिफारिश कर पहली बार विधानसभा का टिकट दिलाया। उद्धव खुद प्रचार करने उतरे, जिताकर लाए। फिर 2004, 2009, 2014, 2019 – लगातार चार बार टिकट दिया। सबसे मलाईदार लोक निर्माण विभाग सौंपा। 2019 में आदित्य ठाकरे ने प्रस्ताव रखकर शिंदे को विधायक दल का नेता बनवाया। बेटे श्रीकांत शिंदे को दो बार टिकट देकर सांसद बनवाया।
और बदला? ‘महागद्दारी’। भाजपा ने 50-50 फॉर्मूले पर वादाखिलाफी की। मजबूरी में उद्धव को मुख्यमंत्री बनना पड़ा। बस यहीं शिंदे की सत्ता की भूख जागी। ‘ऑपरेशन लोटस’ का मोहरा बनकर शिवसेना के दो टुकड़े कर दिए। चुनाव आयोग से मिलकर पार्टी और ‘तीर-कमान’ चिन्ह हथिया लिया। पर लूट यहीं खत्म नहीं हुई। हाल में उद्धव गुट के 6 सांसदों को तोड़ लिया गया। आरोप है कि ईडी-सीबीआई का डर दिखाकर, पद और पैसे का प्रलोभन देकर उन्हें पाला बदलने पर मजबूर किया गया। जो कल तक बाला साहब के विचारों की दुहाई देते थे, आज ‘कमल’ की छांव में बैठ गए। भाजपा बराबर की हिस्सेदार है। ‘गठबंधन धर्म’ को ‘यूज एंड थ्रो’ बना दिया। बिहार में नीतीश को छला, महाराष्ट्र में उद्धव को। वादाखिलाफी अब भाजपा की नीति है। शिंदे तो सिर्फ मोहरा हैं, असली सूत्रधार दिल्ली में बैठे हैं। आनंद दिघे की समाधि आज शर्म से झुकी होगी। बाला साहब की आत्मा तड़प रही होगी। उद्धव ठाकरे ने सत्ता गंवाई, पर मराठी स्वाभिमान नहीं।
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शिंदे ‘महागद्दार’ से ‘राजनीतिक डकैत’ बन चुके हैं। पार्टी लूटी, चिन्ह लूटा, अब सांसद लूट रहे हैं। इतिहास इन्हें माफ नहीं करेगा। जब भी ‘विश्वासघात’ शब्द लिखा जाएगा, साथ में एकनाथ शिंदे का नाम काले अक्षरों में दर्ज होगा।

