Form 6 विवाद पर सुप्रीम कोर्ट की ताजा टिप्पणी और सख्त रुख ने देश की निर्वाचन प्रणाली तथा केंद्र सरकार के प्रशासनिक हलकों में हड़कंप मचा दिया है। देश में नए मतदाता पंजीकरण और संशोधन के लिए इस्तेमाल होने वाले Form 6 तथा स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया पर सुनवाई करते हुए देश की शीर्ष अदालत ने बेहद तल्ख टिप्पणी की है।
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ ने सुनवाई के दौरान साफ कर दिया कि चुनाव आयोग द्वारा ऑनलाइन Form 6 में किए गए किसी भी प्रकार के संशोधित बदलावों को अदालत ने कभी मंजूरी (Approve) नहीं दी है। इस टिप्पणी के बाद जहां विपक्ष आक्रामक हो गया है, वहीं चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
1. Form 6 विवाद पर सुप्रीम कोर्ट: “हमने किसी संशोधन को अप्रूव नहीं किया”
अदालत में याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ताओं—मेनका गुरुस्वामी और विकास सिंह—ने दलील दी कि चुनाव आयोग ने एकतरफा तरीके से Form 6 में वंशावली (Ancestry) और कई कठिन घोषणा पत्र mandatory कर दिए हैं। इसके कारण करोड़ों नागरिक मतदाता बनने के संवैधानिक अधिकार से वंचित हो रहे हैं।

Form 6 विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का दो टूक रुख
सुनवाई के दौरान Form 6 विवाद पर सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने निर्वाचन आयोग के दावों पर सवाल उठाते हुए आधिकारिक रिकॉर्ड पेश करने को कहा।
कोर्ट का दो टूक रुख
“यह बिल्कुल साफ समझ लें कि किसी भी संशोधित Form 6 को हमने अप्रूव नहीं किया है। जब आधिकारिक रिकॉर्ड्स पेश किए जाएंगे, तब हम देखेंगे कि ये बदलाव किसने, किस अधिकार से और किस आधार पर किए हैं।”
— CJI सूर्यकांत
- एकतरफा फैसलों पर कड़ा रुख: अदालत ने संकेत दिया कि यदि रिकॉर्ड में यह पाया गया कि फैसले नियमों के अनुरूप निर्धारित प्रक्रिया या वैधानिक प्रक्रिया के बिना लिए गए हैं, तो संशोधित नियमों पर कड़ी कार्रवाई की जा सकती है।
- केंद्र व ECI को नोटिस: Form 6 विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और भारत निर्वाचन आयोग (ECI) को औपचारिक नोटिस जारी कर विस्तृत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है।
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2. आंतरिक आपत्तियों और वैधानिक नियमों के उल्लंघन का मामला
सुनवाई के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि चुनाव आयोग के भीतर ही इस प्रक्रिया को लेकर असंतोष था। चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी द्वारा उठाई गई लगभग 14 आंतरिक आपत्तियों को दरकिनार करके यह फैसले लागू किए गए थे।
कानूनी दृष्टिकोण से, मतदाता पंजीकरण प्रक्रिया Registration of Electors Rules, 1960 के नियमों के तहत संचालित होती है।
| पक्ष / संस्था | अदालत में रुख व दलील | सुप्रीम कोर्ट का निर्देश / टिप्पणी |
|---|---|---|
| याचिकाकर्ता (विकास सिंह / मेनका गुरुस्वामी) | Form 6 में गैर-कानूनी बदलाव कर वोटर्स को बाहर किया जा रहा है। | कोर्ट ने माना कि नियमों में मनमाना बदलाव नहीं हो सकता। |
| चुनाव आयोग (ECI) | बदलाव अदालती आदेशों व पारदर्शी प्रक्रिया के तहत हुए। | दावा खारिज: कोर्ट ने किसी संशोधन को अप्रूव नहीं किया। |
| विपक्षी दल (INDIA ब्लॉक) | Gen Z और गरीब वोटर्स के नाम काटने की साजिश है। | केंद्र व ECI को कारण बताओ नोटिस जारी। |
विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी नियम में संशोधन के लिए संसद द्वारा तय विधायी प्रक्रिया का पालन आवश्यक है। प्रशासनिक आदेशों के जरिए डिजिटल फॉर्म में बदलाव करना नियमों का सीधा उल्लंघन है।
3. 13 करोड़ वोटर्स और SIR प्रक्रिया पर गहराया संकट
यह विवाद केवल फॉर्म के एक तकनीकी पन्ने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर देश के करोड़ों मतदाताओं पर पड़ रहा है। देशव्यापी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के तहत लगभग 13 करोड़ से अधिक मतदाताओं की जांच की जा रही है।
- वंशावली और कठिन शर्तें: नए Form 6 में पुराने परिजनों के दस्तावेज अपलोड करना अनिवार्य कर दिया गया है, जो ग्रामीण और प्रवासी मजदूरों के लिए व्यावहारिक रूप से असंभव है।
- Gen Z और नए वोटर्स पर असर: 18 से 21 वर्ष के युवा मतदाताओं को रजिस्ट्रेशन में भारी तकनीकी और प्रशासनिक अड़चनों का सामना करना पड़ रहा है।
- पारदर्शिता पर सवाल: Form 6 विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में सच सामने आने के बाद नागरिक समाज और चुनावी विश्लेषक भी अब निर्वाचन प्रणाली की शुद्धता पर चिंता जता रहे हैं।
संवैधानिक प्रावधानों और न्यायिक प्रक्रिया की आधिकारिक जानकारी के लिए Supreme Court of India की आधिकारिक वेबसाइट पर जाएं।

4. चुनावी विश्वसनीयता और भावी राजनीति की दिशा
संसद से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक इस मुद्दे की गूंज सुनाई दे रही है। एक तरफ जहां संसद भवन से लेकर चुनाव आयोग मुख्यालय तक विपक्षी सांसदों का विरोध प्रदर्शन जारी है, वहीं दूसरी तरफ सर्वोच्च अदालत का यह रुख चुनाव आयोग के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है।
Form 6 विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का यह हस्तक्षेप भारत के लोकतांत्रिक मूल्यों को अक्षुण्ण रखने की दिशा में एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हो सकता है। यदि चुनाव आयोग अगली सुनवाई में संतोषजनक रिकॉर्ड्स और दलीलें पेश नहीं कर पाता, तो SIR प्रक्रिया और संशोधित फॉर्म दोनों पर कानूनी रोक लगना तय माना जा रहा है।


