दिल्ली की सड़कों पर तिरंगा लेकर निकलने वाले युवाओं की आवाज अब अमेरिका तक पहुंच गई है। छह अमेरिकी सांसदों ने विदेश मंत्री मार्को रुबियो को पत्र लिखकर भारत दौरे के दौरान दिल्ली में हुए प्रदर्शनों के दमन, गलत हिरासत और SIR प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठाने की मांग की है।
पत्र पर प्रमिला जयपाल, इल्हान उमर, जिम मैकगवर्न, रशीदा तलीब, एलेनोर होम्स नॉर्टन और जीसस गार्सिया के हस्ताक्षर हैं। उन्होंने लिखा है कि दिल्ली और भारत के अन्य इलाकों में छात्र प्रदर्शनों के दौरान सुरक्षा बलों द्वारा दमन, गलत तरीके से हिरासत में लेने और अत्यधिक बल प्रयोग का सिलसिला चल रहा है।
सांसदों ने CJP आंदोलन का खास जिक्र किया। उन्होंने जून में शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग वाले प्रदर्शनों और हाल में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे तथा SIR के खिलाफ चल रहे आंदोलन दोनों का उल्लेख किया। पत्र में कहा गया है कि 10 अक्टूबर के बाद से सैकड़ों लोगों को हिरासत में लिया गया, जिनमें CJP नेता, प्रदर्शनकारी और पत्रकार शामिल हैं। मुंबई में भी 600 से ज्यादा प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया।
SIR प्रक्रिया पर उठे सवाल
सबसे गंभीर आरोप SIR प्रक्रिया पर है। सांसदों ने कहा कि 2025 से अब तक 13 करोड़ से ज्यादा लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार विशेषज्ञों के हवाले से कहा कि इस प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी है और यह मतदान के अधिकार पर अनुचित बाधा डाल सकती है। प्रदर्शनकारियों की मांग—ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा—को भी पत्र में जगह दी गई।
पत्र में एक और चौंकाने वाला आरोप है। अमेरिकी सांसदों ने दावा किया कि भारतीय दूतावास और वाणिज्य दूतावासों ने अमेरिका में CJP समर्थक प्रदर्शनकारियों की निगरानी के लिए फोटोग्राफर तैनात किए। वाशिंगटन, शिकागो और सैन फ्रांसिस्को में प्रदर्शन कर रहे लोगों की तस्वीरें खींची गईं। सांसदों ने रुबियो से कहा कि इस आरोप की जांच हो और अगर सच साबित होता है तो हथियार बिक्री पर असर पड़ने की संभावना भी तलाशी जाए।
रुबियो 17 से 22 अक्टूबर के बीच भारत दौरे पर हैं। वे विदेश मंत्री एस. जयशंकर से मुंबई में मिलने वाले हैं। सांसदों ने साफ कहा है कि दुनिया के दो सबसे बड़े लोकतंत्र होने के नाते अमेरिका और भारत का दायित्व है कि वे सभा करने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकारों की रक्षा करें। उन्होंने रुबियो से अपील की कि वे इन मुद्दों को प्राथमिकता दें।
पत्र में तीन मुख्य मांगें
पत्र में तीन मुख्य मांगें हैं।
पहला—मानवाधिकार उल्लंघन की स्वतंत्र और पारदर्शी जांच हो।
दूसरा—शांतिपूर्ण तरीके से अपने अधिकार का इस्तेमाल करने के लिए हिरासत में लिए गए लोगों को रिहा किया जाए।
तीसरा—अमेरिका में प्रदर्शनकारियों की निगरानी के आरोपों की जांच हो।
ये पत्र ऐसे समय में आया है जब दिल्ली में धारा 163 लागू है, सेंट्रल पार्क बंद है और तिरंगा लहराने वाले युवाओं को हिरासत में लिया जा रहा है। अभिजीत दीपके अभी भी हिरासत में हैं। नेहा बोरा को रिहा किया गया है। फिर भी मांग एक ही है—चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता और ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा।
अमेरिकी सांसदों की ये चिट्ठी साफ दिखाती है कि दिल्ली की सड़कों पर उठी आवाज अब सिर्फ घरेलू राजनीतिक मुद्दा नहीं रह गई। जब युवा तिरंगा लेकर कह रहे हैं कि मतदाता सूची में हो रहे बदलाव लोकतंत्र के लिए खतरा हैं, तो उसकी गूंज अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंच रही है।
भारत सरकार ने पहले प्रमिला जयपाल के बयान को “अनावश्यक हस्तक्षेप” बताया था। लेकिन अब छह सांसदों का सामूहिक पत्र रुबियो के भारत दौरे को और संवेदनशील बना रहा है। दिल्ली के प्रदर्शन, SIR और हिरासतों का मुद्दा अब सिर्फ सड़क या अदालत तक सीमित नहीं रह गया। ये अब दो लोकतंत्रों के बीच के रिश्ते का भी हिस्सा बन चुका है।
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