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Akhand Rashtra News > ताज़ा ख़बरें > प्रधानमंत्री के पर्यावरण प्रेम की आत्मघाती हकीकत.! अडानी के मुनाफे की भट्टी में भूना जा रहा पूरा देश
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प्रधानमंत्री के पर्यावरण प्रेम की आत्मघाती हकीकत.! अडानी के मुनाफे की भट्टी में भूना जा रहा पूरा देश

Digital Desk - Lucknow
Last updated: May 27, 2026 9:23 am
Digital Desk - Lucknow
2 months ago
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प्रधानमंत्री के पर्यावरण प्रेम की आत्मघाती हकीकत.! अडानी के मुनाफे की भट्टी में भूना जा रहा पूरा देश
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पिछले कुछ सालों में देश में पर्यावरण को लेकर दो तस्वीरें एक साथ चल रही हैं। पहली तस्वीर में सरकार आम जनता से भावुक अपील करती है– “एक पेड़ माँ के नाम” लगाइए। स्कूल के बच्चे, सरकारी कर्मचारी, पुलिस वाले सब गमले में पौधे लगाकर कैमरे के सामने मुस्कुराते हैं। दूसरी तस्वीर में उसी सरकार के कार्यकाल में देश के सबसे घने और पुराने जंगल अडानी समूह जैसी बड़ी कंपनियों के कोयला खनन प्रोजेक्ट के लिए काट दिए जाते हैं।

*हसदेव से लेकर गोवा तक: विकास की कीमत कौन चुका रहा है?*
छत्तीसगढ़ का हसदेव अरण्य इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। इसे मध्य भारत का फेफड़ा कहा जाता है। आदिवासी समुदाय सालों से इसे बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। लेकिन परसा, केते एक्सटेंशन जैसी खदानों के लिए यहाँ लाखों पेड़ों की कटाई को मंजूरी मिली। इन खदानों का संचालन अडानी समूह कर रहा है।

केवल हसदेव ही नहीं, राजस्थान, ओडिशा और गोवा में भी अडानी समूह के बंदरगाह, बिजली और खनन प्रोजेक्ट के लिए बड़े पैमाने पर पर्यावरणीय मंजूरी दी गई है। रिपोर्ट बताती हैं कि गोवा में मोपा एयरपोर्ट और उससे जुड़े विकास के नाम पर पश्चिमी घाट के हजारों पेड़ काटे गए। जनता को बताया गया कि यह विकास है, रोजगार है।

*गर्मी में वर्ल्ड रिकॉर्ड और शेयर बाजार में उछाल*
आज नतीजा सबके सामने है। दुनिया के 50 सबसे गर्म शहरों की सूची में 10 से ज्यादा शहर अकेले भारत के हैं। दिल्ली, प्रयागराज, चुरू जैसे शहर 50 डिग्री तक तप रहे हैं। विशेषज्ञ साफ कहते हैं कि बड़े पैमाने पर जंगलों की कटाई, कोयला आधारित बिजली पर निर्भरता और अनियंत्रित शहरीकरण इसकी बड़ी वजह है।

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विडंबना देखिए: जैसे जैसे तापमान का पारा चढ़ता है, जंगल कटने से कोयला उत्पादन बढ़ता है, और अडानी समूह की कंपनियों का मुनाफा भी बढ़ता है। जब जंगल कटते हैं तो ऑक्सीजन घटती है, कार्बन बढ़ता है, लेकिन शेयर बाजार में अडानी एंटरप्राइजेज, अडानी पोर्ट्स के शेयर जरूर ऊपर जाते हैं।

ऐसा लगता है कि नीति का मंत्र यही है: पेड़ कम होंगे तो धूप सीधी जमीन पर पड़ेगी। फिर हम सोलर पावर में भी नंबर वन हो जाएंगे। कोयला भी निकाल लेंगे और सोलर का क्रेडिट भी ले लेंगे।

*विकास के तीन स्तंभ: जनता, मित्र और सरकार*
इस नई परिभाषा वाले विकास के तीन किरदार हैं:

1. *जनता:* 45 डिग्री में बिजली कटौती झेलते हुए सड़क किनारे मरा हुआ पौधा सींच रही है। उसे बताया गया है कि पर्यावरण बचाना उसकी जिम्मेदारी है।
2. *अडानी समूह:* पर्यावरण मंजूरी की फाइलों को रिकॉर्ड समय में पास करवाकर खदान, बंदरगाह और बिजली प्रोजेक्ट चालू कर रहा है। हसदेव के साल के पेड़ उसकी बैलेंस शीट में केवल कार्बन क्रेडिट नहीं, बल्कि करोड़ों टन कोयले का भंडार हैं।
3. *सरकार:* भीषण गर्मी को जलवायु परिवर्तन का स्वाभाविक नतीजा बताती है। साथ ही एसी वाले सम्मेलन कक्षों में बैठकर ईज ऑफ डूइंग बिजनेस के नए मास्टर प्लान बनाती है, जहाँ पर्यावरणीय नियमों को बिजनेस में रुकावट माना जाता है।

*सवाल जो पूछे जाने चाहिए*
क्या एक उद्योग समूह के मुनाफे की भट्टी में पूरे देश के शहरों का भुनना एक छोटी कुर्बानी है? जब पर्यावरण प्रभाव आकलन रिपोर्ट को कमजोर किया जाता है, जब जनसुनवाई औपचारिकता बन जाती है, और जब जंगल बचाने के लिए लड़ रहे आदिवासियों पर मुकदमे होते हैं, तो यह कैसा पर्यावरणीय प्रेम है?

“एक पेड़ माँ के नाम” अभियान अच्छी पहल है, पर जब तक नीतियों में माँ धरती के लाखों पेड़ों की कीमत नहीं समझी जाएगी, तब तक जनता का लगाया एक पेड़, कटे हुए लाखों पेड़ों की राख को नहीं ढक पाएगा।

असली पर्यावरणीय प्रेम नारों में नहीं, नीयत और नीति में दिखता है। वरना आने वाली पीढ़ी हमसे पूछेगी: विकास के नाम पर आपने हमारे सांस लेने की हवा तक क्यों बेच दी?

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