नई दिल्ली, 18 जुलाई। आज स्वतंत्र भारत के इतिहास में एक ऐसा काला पन्ना लिखा गया है, जिसने यह साबित कर दिया कि इस देश में अब जनता की आवाज़ सुनना तो दूर, उसे कुचल देना ही सत्ता का इकलौता धर्म बन चुका है। 18 जुलाई को देश की राजधानी में परीक्षा घोटालों और देश में लगातार हो रहे पेपर लीक जैसे गंभीर मुद्दों पर शांतिपूर्ण ढंग से आवाज़ उठा रहे सोनम वांगचुक को जिस बर्बरता से ज़बर्दस्ती डिटेन करके अस्पताल के कमरों में कैद किया गया, वह सीधे तौर पर लोकतंत्र की क्रूर हत्या है।
यह दमन सिर्फ एक व्यक्ति के खिलाफ नहीं है, बल्कि देश के संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकार—’राइट टू प्रोटेस्ट’ (शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार)—का सरेआम गला घोंटना है। जब सरकारें अपने ही नागरिकों से डरने लगें, तो वे पुलिस को आगे कर देती हैं।
पेपर लीक की महामारी और ‘प्रधान’ की बेशर्मी
आज देश का युवा सड़कों पर है। तमाम बड़ी परीक्षाओं में जो धांधली और पेपर लीक का संगठित खेल चल रहा है, उसने देश के करोड़ों छात्रों का भविष्य अंधकार में डाल दिया है। लेकिन इस पूरे तंत्र के मुखिया, शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के माथे पर जूं तक नहीं रेंग रही। इस विरोध प्रदर्शन की सबसे मुख्य और जायज़ मांग ही यही है कि धर्मेंद्र प्रधान तुरंत अपने पद से इस्तीफा दें। जिसने देश की शिक्षा व्यवस्था को मजाक बना दिया हो, उसे एक पल भी अपनी कुर्सी पर बैठने का नैतिक अधिकार नहीं है।
मगर अफ़सोस, इस सरकार की डिक्शनरी में ‘नैतिकता’ और ‘जवाबदेही’ जैसे शब्द बचे ही नहीं हैं। सरकार की क्रेडिबिलिटी (विश्वसनीयता) आज पूरी तरह शून्य हो चुकी है। देश में चाहे रेलवे हादसे हों, पेपर लीक हो या सीमा पर संकट हो, सरकार का कोई भी नुमाइंदा मुंह खोलने को तैयार नहीं होता।
प्रधानसेवक की चुप्पी और मीडिया का पहरा
इस पूरे तमाशे के बीच सबसे शर्मनाक भूमिका देश के प्रधानमंत्री की है। प्रधानमंत्री अपने कार्यकर्ताओं के सम्मेलनों में व्यस्त हैं, विदेशों के दौरों और हर गैर-ज़रूरी चीज़ों पर उनकी नजर है, लेकिन देश के युवा, किसान और सोनम वांगचुक जैसे देशभक्तों को वो लगातार इग्नोर (अनदेखा) कर रहे हैं। प्रधानमंत्री की यह चुप्पी कोई सामान्य चुप्पी नहीं है, यह जनता को अवॉयड करने की एक सोची-समझी रणनीति है।
जनता के बुनियादी सवालों से भागने के लिए मीडिया को ढाल बनाया गया है। अगर कोई साहसी पत्रकार इस तंत्र से सवाल पूछने की हिम्मत करता है, तो उसकी आवाज़ को दबा दिया जाता है, उसे मुकदमों में फंसा दिया जाता है। इस तानाशाही निज़ाम में सवाल पूछना सबसे बड़ा अपराध बन चुका है।
“जब हुकूमतें जनता के सवालों से डरकर मीडिया का मुंह बंद करने लगें और शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को अपराधियों की तरह अस्पतालों में नजरबंद करने लगें, तो समझ जाना चाहिए कि सत्ता का अहंकार अपने आखिरी दौर में है।”
आर-पार की लड़ाई: 20 जुलाई का फैसला
18 जुलाई की इस बर्बर कार्रवाई ने पूरे देश के आक्रोश को भड़का दिया है। लद्दाख से लेकर दिल्ली तक, छात्रों से लेकर बुद्धिजीवियों तक, अब हर कोई इस दमन के खिलाफ उठ खड़ा हुआ है। लाठी, पुलिस और प्रशासनिक शक्तियों के दुरुपयोग से आप कुछ समय के लिए आवाज़ों को कैद कर सकते हैं, लेकिन उस वैचारिक क्रांति को नहीं रोक सकते जो संसद की दीवारों को हिलाने का दम रखती है।
अब पानी सिर से ऊपर जा चुका है। अब इसका फैसला 20 जुलाई को आकर रहेगा कि लोकतंत्र की जीत होती है और सरकार घुटने टेकती है, या फिर जंतर-मंतर से चलकर लोकतंत्र की लाश को संसद भवन पहुंचने से पहले ही दफना दिया जाएगा, जिसकी कल 18 जुलाई को हत्या कर दी गई थी।

