पुलिसवालों की तो शक्ल एक ही होती है, मगर आत्मा अलग-अलग है। एक शक्ल में केवल वर्दी नहीं, बल्कि उसमें पुख्ता भरोसे की धड़कन सुनाई पड़ती है। लेकिन इसी वर्दी में अक्सर एक हत्यारा, अराजक, क्रूर और बेहद लापरवाह हिंसक जानवर घूमता है। यही वजह है कि अतीक और अशरफ को न्यायिक हिरासत में ले जाते वक्त ही पुलिस कस्टडी में गोली मार कर हत्या कर दी जाती है और पुलिसवाले केवल गाल बजाते घूमते रहते हैं। कभी वे फर्जी एनकाउंटर करते हैं, तो कहीं अपनी असफलता पर लोगों के घुटनों पर सीधे गोली मार कर अपनी वाह-वाही बटोरते हैं। यही वर्दी का शक्ल आपको किसी सिनेमा हॉल की ठंडी कुर्सियों पर धुरंधर बनने का सस्ता नाटक सीखने की नौटंकी करता रहता है। लेकिन जिनमें जिन्दगी धड़कती है, वे कहीं मेले में एक रोते बच्चे की हंसी बनकर खिलती है, और पूरे समाज में एक संदेश देती रहती है कि बेफिक्र रहो। हम आपके साथ हैं और आपके लिए ही हैं।
यह कहानी है दो जिलों की, दो सोच की, दो अलग अलग तस्वीरों की। एक तस्वीर इटावा की, जहां तत्कालीन एसएसपी वैभव कृष्ण ने बिना किसी प्रोटोकॉल के, बिना किसी कैमरे के एक मासूम के आंसू पोंछे थे। दूसरी तस्वीर मेरठ की, जहां एसएसपी अविनाश पांडेय 26 मार्च 2026 को 498 नए उप निरीक्षकों को लेकर शॉप्रिक्स मॉल के वेव सिनेमा में जा पहुंचे। दो पूरे हॉल बुक कराए गए, सरकारी वाहनों में दारोगाओं को ढोया गया और फिर दिखाई गई फिल्म धुरंधर 2
सवाल यह है कि क्या पुलिस की ट्रेनिंग अब सिनेमा के पर्दे पर तय होती है क्या असली जमीन की चुनौतियों से निपटने के लिए फिल्मी डायलॉग काफी हैं और क्या इसी धुरंधर बनने की चाह में हम वो घटनाएं भूल गए जहां खाकी अपनी ही कस्टडी में कानून को तार तार करती नजर आई
इटावा की वह तस्वीर देखिये, जहां इंसानियत ने पद को मात दे दी थी। कुछ बरस पहले की बात है। एक बच्चा रोता हुआ एसएसपी वैभव कृष्ण के दफ्तर पर पहुंचा। वह अपने पिता से नाराज था। वह मेला देखने जाना चाहता था, लेकिन बाप के पास पैसा नहीं था। बच्चा इतना गुस्से में था कि वैभव कृष्ण से बोला कि पापा को जेल भेज दो।
न कोई औपचारिकता, न कोई प्रोटोकॉल का रोना, न कोई ये मेरा काम नहीं है वाली अहमियत। वैभव कृष्ण ने बस एक इंसान की तरह महसूस किया कि सामने एक मासूम दर्द में है। उन्होंने जेब से पैसा देकर अपने दो दारोगाओं ड्यूटी लगा दी जिन्होंने मेला लेकर बच्चे को झूला झुलाया, खिलाया पिलाया, और देखते ही देखते जो चेहरा रो रहा था वह हंसी से खिल उठा।
यह कोई बड़ा ऑपरेशन नहीं था। कोई एनकाउंटर नहीं था। किसी के घुटने पर गोली मार उसकी जिन्दगी बर्बाद करने की क्रूर और दरिंदे जैसी करतूत भी नहीं थी। कोई धुरंधर वाला डायलॉग नहीं था। लेकिन यह एक ऐसी तस्वीर थी जिसने पूरे देश को बता दिया पुलिस और जनता का रिश्ता डंडे से नहीं दिल से बनता है। यह सिखाने वाला कोई फिल्मी सीन नहीं था, यह असल जिंदगी थी।
अब देखिये मेरठ में किस तरह एक सिनेमा हॉल में धुरंधर बनने की क्लास चलाने की कोशिश हो रही है। कल 26 मार्च को एसएसपी अविनाश पांडेय ने 2023 बैच के 498 नए उप निरीक्षकों को पुलिस लाइन से सरकारी वाहनों में लादा, और सीधे शॉप्रिक्स मॉल के वेव सिनेमा ले गए, जहां उन्होंने दो पूरे हॉल बुक किए गए और दिखाई गई फिल्म धुरंधर-2। तर्क दिया गया फिल्म के जरिए पुलिसिंग की चुनौतियां, माफिया से मुकाबला, टीमवर्क और जोखिम भरे हालात समझाए जा सकते हैं। कुछ दारोगा बाहर निकले तो कहने लगे बहुत कुछ सीखने को मिला।
लेकिन क्या सच में सीखने को मिला। क्या फिल्मों में दिखाया गया पुलिस वाला हीरो असल जिंदगी का पुलिसकर्मी होता है। फिल्मों में पुलिस साफ सुथरी होती है, तेज होती है, हर एनकाउंटर सही होता है, हर फैसला न्यायपूर्ण होता है। असल जिंदगी में पुलिसिंग कानून की सैकड़ों सीमाओं में बंधी होती है। हर गोली पर सवाल उठते हैं। हर चूक की कीमत पूरे सिस्टम को चुकानी पड़ती है। सिनेमा में धुरंधर बनना आसान है, असल जिंदगी में इंसान बनना मुश्किल। जिन्दगी में जितने भी धुरंधर बनने के लिए लोग मशहूर हैं, वे सब के सब निहायत घिनौने अपराधों और उगाही में लिप्त रहे हैं। ऐसे ऐसे आरोप लगे हैं ऐसे धुरंधरों पर कि आम आदमी और पुलिस नियमावली ही शर्म से डूब मरे। मगर पुलिस में जो इंसान है, उसका कलेजा इंसानियत से लबरेज है। हां, उसे न उतनी शोहरत मिल पाती है और न ही हराम की कमाई। अथवा सुविधा से भरा जीवन।
आइये, इसी बात पर हम आपको ले चलते हैं इलाहाबाद, 15 अप्रैल 2023 को लाइव टीवी के सामने पुलिस कस्टडी में जहां अतीक अहमद और उसके भाई अशरफ अहमद की हत्या कर दी गई। तीन हमलावर पुलिस टीम के साथ ही बातचीत कर रहे थे। गोलियां चलाईं, और पूरे देश ने देखा पुलिस की मौजूदगी में सुरक्षा कैसे ध्वस्त हो सकती है।
आज भी वो सवाल तैर रहे हैं। क्या यह सिर्फ लापरवाही थी या साजिश। क्या कस्टडी में सुरक्षा का पूरा प्रोटोकॉल अपनाया गया था। क्या इस घटना से कोई सबक लिया गया। नहीं।
जब हम मेरठ में 498 नए दारोगाओं को फिल्म दिखाकर धुरंधर बनने की प्रेरणा दे रहे हैं तो क्या उन्हें यह भी सिखाया जा रहा है कि असली बहादुरी सिर्फ गोली चलाने में नहीं बल्कि कानून का पालन करने में है क्या उन्हें बताया जा रहा है कि अपराधी पकड़ना भी जिम्मेदारी है लेकिन उसकी सुरक्षित कस्टडी सुनिश्चित करना उससे भी बड़ी जिम्मेदारी है। सिनेमा हॉल या सड़क असली ट्रेनिंग कहां होती है, इस सवाल का जवाब तो पुलिस के आला अफसरों को ही देना होगा न।
एक तरफ इटावा की वो तस्वीर है जहां एक एसएसपी बिना किसी अहंकार के एक बच्चे को झुला पर घुमा रहा है। यह तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हुई तो लाखों लोगों ने सलाम किया। क्योंकि यह दिखा रही थी कि पुलिस अगर चाहे तो कितनी इंसानियत भरी हो सकती है। दूसरी तरफ मेरठ की वो तस्वीर है जहां सरकारी खर्चे पर सिनेमा हॉल बुक किए गए, सरकारी वाहन दौड़ाए गए, और नए दारोगाओं को समझाया गया कि धुरंधर बनो। लेकिन यह तस्वीर जनता तक नहीं पहुंच रही। क्योंकि जनता को सिनेमा हॉल में बैठे पुलिसकर्मी से कोई मतलब नहीं है। जनता को पुलिसकर्मी चाहिए थाने में, सड़क पर, उस पल में जब वह मुसीबत में हो।
खाकी का असली चेहरा क्या है। पुलिस की खाकी सिर्फ एक वर्दी नहीं, एक सोच है। और यह सोच दो रास्तों पर चल रही है। पहला रास्ता इटावा का रास्ता जहां पुलिस जनता के बीच जाती है, उनके दर्द को समझती है, बिना किसी दिखावे के इंसानियत को चुनती है। यह वो रास्ता है जहां एक बच्चे की मुस्कान पूरी व्यवस्था की छवि बदल देती है। दूसरा रास्ता मेरठ का रास्ता जहां पुलिस सिनेमा हॉल में बैठकर धुरंधर बनने का अभ्यास करती है। यह वो रास्ता है जहां ऊर्जा तो भरी जाती है लेकिन वह ऊर्जा जनता तक पहुंचती नहीं है। यह वो रास्ता है जहां फिल्मी डायलॉग असल जिंदगी की पेचीदगियों से टकराकर टूट जाते हैं।
तो फिर आइये हम लोग अपने गिरहबान में झांकें कि हम किस खाकी को चुनते हैं। आखिरकार पुलिस की असली पहचान न सिनेमा हॉल में बनती है, न फिल्मी डायलॉग में। वह बनती है सड़क पर, थाने में, और उन छोटे छोटे पलों में जब कोई वर्दीधारी इंसान, इंसानियत को चुनता है। एक रोते हुए बच्चे को हंसाना यह पुलिस की जिम्मेदारी है। एक आरोपी को सुरक्षित रखना यह भी पुलिस की जिम्मेदारी है। एक आम आदमी का भरोसा जीतना यह सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।
मेरठ के एसएसपी से सवाल है क्या सिनेमा हॉल में बैठकर धुरंधर-2 देखने वाले 498 दारोगा उस दिन असली धुरंधर बन जाएंगे जब उनके सामने कोई बच्चा रोएगा, क्या वे उस बच्चे को झुलाएंगे या प्रोटोकॉल की दीवारों के पीछे छिप जाएंगे। और सबसे बड़ा सवाल क्या हमारी पुलिस यह तय कर पाएगी कि असली धुरंधर वह है जो सिनेमा के पर्दे पर गोलियां चलाता है या वह जो असल जिंदगी में एक बच्चे की हंसी लौटाता है। इंसानियत की जीत कहां होती है मेले में या मॉल में खाकी का असली चेहरा क्या है मुस्कान या मॉल। यह सवाल सिर्फ मेरठ और इटावा का नहीं, हर उस थाने का है जहां आज भी कोई वर्दीधारी यह तय कर रहा है कि वह धुरंधर बनेगा या इंसान।
और शायद यही तय करेगा कि आने वाला समय किस तस्वीर को याद रखेगा सिनेमा हॉल में बैठे 498 दारोगाओं की भीड़ को या मेले में एक बच्चे को झुलाते उस एसएसपी की एकाकी परिंदे जैसी मुस्कान को।
और अब एक बेहद चुभने वाला सवाल आप मेरठ के एसएसपी, यूपी के डीजीपी और मुख्य सचिव से पूछ लीजिए, कि इस इन दोनों हॉल पर टिकट का भुगतान किसने और किस मद से अदा किया था। यह भी कि जब पूरा देश में पेट्रोल-डीजल की मारामारी चल रही है, 498 दारोगाओं को गाडि़यों से सिनेमा हाल तक आने-जाने का औचित्य क्या है। इसका खर्चा कौन देगा, वह दारोगा या सरकारी खजाना। ऐसा ही एक बकलोल डीजीपी था ओपी सिंह। तीस साल पहले लखनऊ के स्टेट गेस्ट हाउस में जब मुलायम सिंह यादव और उनके गुंडे मायावती के साथ मारपीट कर रहे थे, तब माहौल को नियंत्रित करने के बजाय ओपी सिंह बाहर खड़ा सिगरेट पी रहा था। उस समय ओपी सिंह लखनऊ का एसएसपी हुआ करता था।
कुमार सौवीर
वरिष्ठ पत्रकार
