नई दिल्ली, 11 अक्टूबर 2026। दिल्ली में CJP के प्रदर्शन को लेकर हिरासत में लिए गए तीन नेताओं को रविवार को रिहा कर दिया गया। इनमें CJP के संस्थापक अभिजीत दीपके, सौरव दास और आशुतोष रंका शामिल हैं। तीनों को शनिवार को दिल्ली पहुंचने पर पुलिस ने एहतियातन हिरासत में लिया था। रविवार सुबह उन्हें दिल्ली कैंट स्थित विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया गया, जहां से शांति बनाए रखने की शर्त पर उनकी रिहाई हुई।
इस बीच, दिल्ली में मेट्रो और इंटरनेट सेवाओं पर लगाई गई पाबंदियों का मुद्दा भी सुप्रीम कोर्ट में उठा। अदालत ने सार्वजनिक परिवहन को सामान्य बनाए रखने, लोगों की आवाजाही में अनावश्यक बाधा दूर करने और इंटरनेट सेवाएं बहाल रखने पर जोर दिया।
शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में विरोध-प्रदर्शन के दौरान लगाए गए व्यापक प्रतिबंधों पर चिंता जताई। अदालत का जोर इस बात पर रहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए उठाए जाने वाले कदमों से आम नागरिकों की आवाजाही और जरूरी सेवाएं प्रभावित नहीं होनी चाहिए।
अदालत ने मेट्रो और रेलवे सेवाओं को पूरी तरह रोकने के बजाय जरूरत के अनुसार नियंत्रित करने पर जोर दिया। इंटरनेट सेवाओं को लेकर भी सुनवाई हुई। अदालत में बताया गया कि इंटरनेट सेवा पिछली रात से बहाल कर दी गई थी।
एक साल तक शांति बनाए रखने की शर्त पर रिहाई
समाचार एजेंसी आकाशवाणी की रिपोर्ट के अनुसार, तीनों नेताओं को 50 हजार रुपये के जमानती मुचलके पर रिहा किया गया। उन्हें एक साल तक शांति और अच्छा व्यवहार बनाए रखने की शर्त दी गई है। उनकी हिरासत को लेकर कानूनी सवाल भी उठे थे।
ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन
CJP का प्रदर्शन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से जुड़े आरोपों को लेकर हो रहा है। प्रदर्शनकारियों ने मतदाता सूची में नाम हटाए जाने की प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। हालांकि, मतदाता सूची में गड़बड़ी को लेकर लगाए गए आरोपों और उनके आधार का स्वतंत्र रूप से सत्यापन जरूरी है।
दिल्ली में प्रदर्शन के दौरान सुरक्षा व्यवस्था कड़ी की गई थी। कई मेट्रो स्टेशनों पर आवाजाही प्रभावित हुई और कुछ इलाकों में इंटरनेट सेवाओं पर पाबंदियां लगाई गई थीं। इससे आम लोगों को भी परेशानी का सामना करना पड़ा।
CJP के तीन नेताओं की रिहाई और दिल्ली में सार्वजनिक सेवाओं को सामान्य बनाए रखने को लेकर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार तथा कानून-व्यवस्था के बीच संतुलन की बहस को फिर सामने ला दिया है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध दर्ज कराने का अधिकार महत्वपूर्ण है, वहीं प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए आम नागरिकों की सुविधाओं और कानूनी अधिकारों का भी ध्यान रखे।


