नई दिल्ली: राजधानी दिल्ली में कल होने वाले युवा-नेतृत्व वाले प्रस्तावित प्रदर्शन से पहले जिस तरह के प्रशासनिक और राजनीतिक हालात बन रहे हैं, उसने सियासी गलियारों में खलबली मचा दी है। सोशल मीडिया और राजनीतिक चर्चाओं में इसे अब “Jantar Mantar 2.0” नहीं बल्कि “नेपाल 2.0” की आहट के तौर पर देखा जा रहा है। देश के कोने-कोने से युवाओं और प्रदर्शनकारियों के दिल्ली कूच की खबरों के बीच सरकार और सुरक्षा एजेंसियों के माथे पर बल पड़ गए हैं।
“GEN-Z को संभालना मोदी के बस की बात नहीं”
राजनीतिक जानकारों और सोशल मीडिया पर यह चर्चा जोरों पर है कि आज के दौर के युवाओं (Gen-Z) और जनता के आक्रोश को संभालना आसान नहीं रह गया है। सुरक्षा व्यवस्था इतनी कड़ी कर दी गई है कि दिल्ली की ओर आने वाले सभी बॉर्डर लगभग सील कर दिए गए हैं। राजधानी की सुरक्षा में हजारों जवानों को तैनात किया गया है, जिससे शहर के भीतर किलेबंदी जैसे हालात नजर आ रहे हैं।
थमे पहिए: ट्रेनें रद्द और मेट्रो स्टेशनों पर ताले
सुरक्षा के नाम पर प्रशासन ने बेहद सख्त कदम उठाए हैं। राष्ट्रीय राजधानी की तरफ आने वाली कई महत्वपूर्ण ट्रेनों को रद्द या डायवर्ट कर दिया गया है, जिससे यात्रियों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। इसके अलावा, शहर के 57 प्रमुख मेट्रो स्टेशनों पर एंट्री और एग्जिट बंद रखने की योजना पर काम चल रहा है, ताकि भीड़ को संवेदनशील इलाकों तक पहुंचने से रोका जा सके। दिल्ली की रफ्तार पर पूरी तरह ब्रेक लगता दिखाई दे रहा है।
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विपक्ष की मौजूदगी से बढ़ा पारा, अब होगा बड़ा धमाका?
इन सबके बीच सबसे बड़ा सियासी मोड़ यह है कि इस आंदोलन और विरोध के समर्थन में तमाम विपक्षी नेता भी दिल्ली में डटे हुए हैं। बॉर्डर सील होने और परिवहन के साधन ठप होने के बावजूद देश के विभिन्न हिस्सों से लोगों के पहुंचने का सिलसिला जारी है। ऐसे में कयास लगाए जा रहे हैं कि प्रशासन की तमाम सख्ती के बावजूद स्थितियां किसी भी वक्त गंभीर मोड़ ले सकती हैं और आने वाले घंटों में दिल्ली में कुछ बहुत बड़ा देखने को मिल सकता है।
अंतिम अध्याय!
कॉकरोच जनता पार्टी का वो प्रदर्शन जिसने देश के लोकतंत्र में दोबारा जान फूक दी थी, तो केवल शांति प्रदर्शन था, लेकिन इस बार मामला पूरा अलग दिख रहा है, नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी, सपा प्रमुख अखिलेश यादव, बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, अभिजीत दिपके, ध्रुव राठी जैसे दिग्गज नाम ऐसे है , जो अकेले ही सरकार के नाक में दम रखने की ताकत रखते है, देखना ये है की ऐसे में इन सब के कल एक साथ आने पर क्या परिस्थिति बनती है, और अगर ऐसे में पुलिस प्रशाशन के तरफ से कोई भी असंतोषजनक कदम उठाया जाता है तो इस बार जंतर मंतर को नेपाल या किसान आन्दोलन जैसे उग्र रूप लेने में देर नहीं लगेगी…


