कोई भी भूमि….!
अचानक ही अनुर्वर नहीं हो जाती…
उसके अतीत में झाँको तो सही…
निश्चित तौर पर आपको दिखेगी
उसकी पूर्व की उर्वरा शक्ति…
सुनने को मिलेगी कहानी कि….!
पहले कभी थे….इस पर भी….
लहलहाते वन-उपवन,हरे-भरे मैदान
बाग-बागीचे….खेत-खलिहान….
प्रकृति के कोप बश….शायद….!
अचानक आयी विपदा से….
सूख गए होंगे…विलुप्त हो गए होंगे
डिस्टर्ब भी हुआ होगा…..!
वहाँ का केमिकल बैलेंस….
इसी इम्बैलेंस को ठीक करने…
औऱ…बीते दिनों के नुकसान की…
भरपाई करने का दायित्व….
ईश्वर ने…हम सबको सौपा है….
यह अतिशयोक्ति भी नहीं प्यारे…!
कि….इस धरा पर….
सुखी रहा है….हर कोई वह व्यक्ति..
जिसने कभी बीज बोया है….
या फिर….कोई पौध रोपा है….
दुखी वह हर व्यक्ति रहा है….
जिसने मान लिया कि….!
अकारण ही लोगों ने….
उस पर यह काम थोपा है….
मित्रों यह सार्वभौमिक सच है कि…
ब्रह्माण्ड की हर एक भूमि में….
अलग सी होती है उर्वरा शक्ति…
इसलिए कभी-कभी….!
ऊसर-बंजर भूमि में भी….
बीज डाला करो प्यारे,
पौध रोपा करो प्यारे….
ताकि आपके कारण….
सृजन की परिकल्पना गतिमान रहे..
वैसे तो….यह ध्रुव सत्य है कि….!
इस ब्रह्माण्ड की कोई भी मातृशक्ति
बाँझ कहलाना नहीं चाहती….
कोई भी मातृशक्ति….!
बाँझ कहलाना नहीं चाहती….
रचनाकार…..
जितेन्द्र कुमार दुबे
अपर पुलिस उपायुक्त,लखनऊ
