12 अक्टूबर को देश की राजधानी दिल्ली में एक साथ दो बड़े मार्च निकाले गए। एक मार्च विपक्ष ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ निकाला, तो दूसरा मार्च कांग्रेस के एक सांसद पर यौन उत्पीड़न के आरोपों पर कार्रवाई की मांग को लेकर था। यानी उस दिन दिल्ली की सड़कों पर दोनों तरफ से प्रदर्शन हुए। इस पूरे घटनाक्रम में सुप्रीम कोर्ट, चुनाव आयोग, दिल्ली पुलिस और केंद्र सरकार की भूमिका लगातार चर्चा में रही। दिनभर की इस हलचल ने यह साफ कर दिया कि आने वाले दिनों में सियासी टकराव और तेज हो सकता है।
राहुल गांधी ने ज्ञानेश कुमार पर क्या आरोप लगाए
12 अक्टूबर की सुबह करीब साढ़े 11 बजे नेता विपक्ष राहुल गांधी अपने सरकारी बंगले से निकले और कांग्रेस मुख्यालय पहुंचे। यहां करीब 40 मिनट चली प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने सवाल उठाया कि भारत की राजधानी दिल्ली जेल क्यों बन गई है। उन्होंने कहा कि यह लड़ाई चार मोर्चों पर है और विपक्ष सड़क के साथ-साथ विचारों के स्तर पर भी लड़ रहा है। राहुल गांधी ने एक बार फिर दोहराया कि ज्ञानेश कुमार को सरकारी गवाह बन जाना चाहिए। जब एक पत्रकार ने पूछा कि क्या उनकी ज्ञानेश कुमार से कोई बात हुई है, तो राहुल ने कहा कि उन्हें लगातार मैसेज आ रहे हैं। उन्होंने यह भी दावा किया कि करीब 200 अधिकारी उनके संपर्क में हैं। कॉकरोच जनता पार्टी को लेकर पूछे गए सवाल पर राहुल गांधी ने कहा कि यह आंदोलन शिवजी की बारात जैसा है, जिसमें कोई भी शामिल हो सकता है। उन्होंने कहा कि इस आंदोलन का मकसद ज्ञानेश कुमार को हटाना और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा गृह मंत्री अमित शाह की जवाबदेही तय करना है।
CJI ने विपक्षी सांसदों से मिलने से क्यों मना किया
विपक्ष के मार्च की असली वजह समझने के लिए एक दिन पीछे जाना पड़ेगा। 11 अक्टूबर को विपक्षी सांसदों ने चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत को चिट्ठी लिखकर ज्ञापन सौंपने के लिए मुलाकात का वक्त मांगा था। उसी रात सीजेआई का जवाब आ गया और उन्होंने मिलने से मना कर दिया। सीजेआई ने अपने जवाब में कहा कि लंबित मामलों पर चर्चा के लिए बैठक करना शक्तियों के बंटवारे के सिद्धांत के खिलाफ होगा, जो संविधान के बुनियादी ढांचे का हिस्सा है। उन्होंने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट के पास चिट्ठी में उठाए गए मुद्दों से निपटने के लिए जरूरी अधिकार नहीं हैं। हालांकि सीजेआई ने आगे का रास्ता भी बताया। उन्होंने कहा कि ऐसे ही कुछ मामलों की सुनवाई 13 अक्टूबर को होनी है और विपक्षी सांसद 12 अक्टूबर को सुबह साढ़े 10 बजे से शाम साढ़े 4 बजे के बीच सुप्रीम कोर्ट में याचिका जमा कर सकते हैं। 12 अक्टूबर की सुबह जब सीजेआई से पूछा गया कि चिट्ठी में क्या लिखा था, तो उन्होंने कहा कि यह विपक्षी सांसदों से पूछिए। साथ ही उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे सबके लिए खुले हैं।
विपक्षी सांसदों का सुप्रीम कोर्ट तक मार्च
सीजेआई के जवाब के बाद विपक्षी सांसद कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में इकट्ठा हुए। वहां पहले जमकर नारेबाजी हुई। समाजवादी पार्टी के धर्मेंद्र यादव, शिवसेना उद्धव गुट के संजय राउत, जेएमएम की महुआ माझी और टीएमसी की महुआ मोइत्रा समेत कई जाने-माने नेता वहां नजर आए। करीब ढाई बजे बसें रवाना हुईं। इनमें कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, तेजस्वी यादव और मनोज झा समेत कई नेता मौजूद थे। बस में एआईएसए नेता नेहा बोरा और एक्टिविस्ट योगेंद्र यादव भी थे। तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी, डिप्टी सीएम भट्टी विक्रमार्क, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष, सांसद और विधायक भी प्रदर्शन में पहुंचे। रिपोर्ट्स के मुताबिक कांग्रेस ने अपने चारों मुख्यमंत्रियों, सभी राज्यों के नेता विपक्ष और प्रदेश अध्यक्षों को दिल्ली बुलाया था। कांग्रेस मुख्यालय के बाहर कार्यकर्ताओं के ठहरने के लिए बड़ा टेंट लगाया गया। लखनऊ से समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव भी दिल्ली के लिए रवाना हुए। करीब 3 बजे बसें बाराखंभा रोड पहुंचीं। बसों के पहुंचते ही वहां भीड़ बढ़ने लगी और नेता सुप्रीम कोर्ट की तरफ बढ़ने लगे।
विपक्ष का पहला प्रदर्शन नहीं था यह
ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और एसआईआर के खिलाफ यह विपक्ष का पहला प्रदर्शन नहीं था। 6, 7, 8 और 9 अक्टूबर को भी विपक्षी सांसद प्रदर्शन कर चुके थे। 6 अक्टूबर को चुनाव आयोग तक मार्च के दौरान राहुल गांधी बैरिकेड पर चढ़ गए थे। इसके बाद वह आकाशवाणी भवन में धरने पर बैठ गए थे। 7 और 8 अक्टूबर को लंच डिप्लोमैसी के जरिए प्रदर्शन किया गया। विपक्षी नेताओं ने कनॉट प्लेस में लंच करने के बाद जंतर-मंतर और राजघाट की ओर कूच किया था। यानी विपक्ष लगातार अपनी मांगों को लेकर सड़क पर उतर रहा है और हर दिन नए तरीके से प्रदर्शन कर रहा है।
दिल्ली के छह मेट्रो स्टेशन बंद, 30 हजार से ज्यादा जवान तैनात
12 अक्टूबर की सुबह दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन ने एक्स पर पोस्ट कर सेंट्रल दिल्ली के छह मेट्रो स्टेशन बंद करने की जानकारी दी। इसकी वजह सुरक्षा बताई गई। इन स्टेशनों पर इंटरचेंज यानी मेट्रो की लाइन बदलने की सुविधा चालू रही। इसका मतलब था कि यात्री ट्रेन बदल सकते थे, लेकिन स्टेशन से बाहर नहीं निकल सकते थे। डीएमआरसी ने यह भी कहा कि सुरक्षा एजेंसियां हालात की समीक्षा करेंगी और आगे की जानकारी दी जाएगी। यह इसलिए अहम है क्योंकि एक दिन पहले 11 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि दिल्ली मेट्रो सामान्य रूप से चले और इंटरनेट बाधित न हो। हालांकि अदालत ने यह भी कहा था कि अगर संविधान के अनुच्छेद 19(2) के तहत सार्वजनिक व्यवस्था को खतरा हो, तो पाबंदियां लगाई जा सकती हैं। अब सवाल है कि 12 अक्टूबर को लगाई गई पाबंदियां इस अपवाद के दायरे में आती हैं या नहीं। यह मुद्दा 13 अक्टूबर को अदालत में उठ सकता है। दिल्ली में 30 हजार से ज्यादा पुलिस और अर्धसैनिक बलों की तैनाती जारी रही। मंडी हाउस और सुप्रीम कोर्ट के आसपास सुरक्षा बढ़ा दी गई। दिलचस्प बात यह है कि राहुल गांधी ने सुबह प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि वह चाहते हैं कि 20 से 30 हजार पुलिसकर्मी सड़क पर हों, ताकि देश देख सके कि सरकार ज्ञानेश कुमार को किस हद तक बचा रही है।
सुप्रीम कोर्ट में वकीलों के साथ बदसलूकी का मुद्दा उठा
सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष प्रदीप राय और वरिष्ठ वकील आत्माराम नाडकर्णी ने 10 अक्टूबर को विरोध प्रदर्शन के दौरान वकीलों के साथ हुई बदसलूकी का मुद्दा उठाया। सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने मामले की सुनवाई की। सीजेआई ने कहा कि इस मामले पर 13 अक्टूबर को विस्तार से सुनवाई होगी। उन्होंने यह भी कहा कि लोकतांत्रिक गतिविधियां होनी चाहिए और उनसे कोई परेशानी नहीं है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट का कामकाज प्रभावित नहीं होना चाहिए। सीजेआई ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट किसी राजनीतिक दल के साथ नहीं है और अदालत को इस तरह के मामलों में नहीं घसीटा जाना चाहिए। वकीलों, कोर्ट स्टाफ और मुकदमा लड़ने वालों की आवाजाही में कोई रुकावट नहीं होनी चाहिए। इसके बाद वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायणन ने नई याचिका का जिक्र किया। उन्होंने आरोप लगाया कि वकीलों को सड़कों पर घसीटा गया। वरिष्ठ वकील शादान फरासत को घसीटे जाने के दृश्य लोगों ने देखे। दिनेश द्विवेदी और उत्तरा बब्बर को बसों में हिरासत में रखा गया। शंकरनारायणन ने कहा कि अदालत वकीलों से संयम रखने की बात करती है और उम्मीद है कि एक दिन पुलिस से भी यही बात कही जाएगी। सीजेआई ने इस पर फिलहाल कुछ भी कहने से इनकार कर दिया। उन्होंने इतना जरूर कहा कि बार के हर सदस्य को शांतिपूर्ण प्रदर्शन में शामिल होने का अधिकार है, लेकिन प्रदर्शन तय जगहों पर होना चाहिए।
फॉर्म 6 पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा
सुप्रीम कोर्ट से एक और अहम खबर आई, जो वोटर लिस्ट में नया नाम जुड़वाने के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म 6 से जुड़ी है। 12 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 27 मई को बिहार एसआईआर मामले में दिए गए फैसले में फॉर्म 6 में किए गए बदलावों को न तो मंजूरी दी गई थी और न ही खारिज किया गया था। इसकी वजह यह है कि उस फैसले में सिर्फ बिहार में पायलट एसआईआर की वैधता पर विचार किया गया था। फॉर्म 6 में बदलाव उसके बाद जुलाई में किए गए थे। ईसीआईनेट पोर्टल पर नए आवेदकों के लिए एक अतिरिक्त घोषणा जोड़ी गई थी। आवेदकों को बताना था कि पिछली एसआईआर की वोटर लिस्ट में उनका, उनके माता-पिता या दादा-दादी का नाम था या नहीं। इस सवाल का जवाब दिए बिना फॉर्म जमा नहीं किया जा सकता था। सीजेआई सूर्यकांत की बेंच में शामिल जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने मौखिक टिप्पणी में कहा कि जब बिहार एसआईआर मामले की सुनवाई हुई थी, तब नया फॉर्म 6 आया ही नहीं था। अदालत ने न तो इसे मंजूरी दी थी और न ही खारिज किया था। उन्होंने कहा कि अब अदालत इस मामले की जांच करेगी। यह टिप्पणी प्रिया मिश्रा की याचिका पर आई, जिसमें कई राज्यों में एसआईआर के दौरान फॉर्म 6 में किए गए बदलावों को चुनौती दी गई है।
दिल्ली हाईकोर्ट में भी प्रदर्शन से जुड़ी याचिकाएं
दिल्ली हाईकोर्ट में भी हलचल रही। जंतर-मंतर बंद किए जाने के खिलाफ दायर याचिका पर हाईकोर्ट ने तुरंत सुनवाई करने से इनकार कर दिया और मामले को 13 अक्टूबर के लिए सूचीबद्ध कर दिया। एक्टिंग चीफ जस्टिस नितिन सांबरे ने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले से ही इससे जुड़े मामले सुन रहा है। 10 अक्टूबर की हिंसा की एसआईटी जांच की मांग वाली एनएसयूआई की याचिका पर भी 13 अक्टूबर को सुनवाई होनी है। इस बीच दिल्ली हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के सदस्य 12 अक्टूबर को काली रिबन बांधकर अदालत पहुंचे। हाईकोर्ट के लॉन में वकीलों ने संविधान की प्रस्तावना भी पढ़ी।
CJP ने दिल्ली पुलिस को दिया 24 घंटे का अल्टीमेटम
कॉकरोच जनता पार्टी के सह-संयोजक आशुतोष रांका और सौरव दास 12 अक्टूबर को संसद मार्ग थाने पहुंचे। उनका मकसद जंतर-मंतर पर ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन के लिए तारीख और वक्त मांगना था। करीब आधे घंटे की बैठक के बाद सीजेपी ने पुलिस को 24 घंटे का अल्टीमेटम दे दिया। रांका ने कहा कि अगर 24 घंटे में जवाब नहीं आया, तो वे खुद तय करेंगे कि जंतर-मंतर कब लौटना है और प्रदर्शन की नई तारीख का ऐलान करेंगे।
जंतर-मंतर अब प्रदर्शन की तय जगह नहीं
दोपहर तक खबर आ गई कि दिल्ली पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार के 11 अक्टूबर के स्टैंडिंग ऑर्डर के मुताबिक जंतर-मंतर अब प्रदर्शन की तय जगह नहीं है। उसकी जगह तीन नए मैदानों को चुना गया है, जिनमें रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान और पूर्वी दिल्ली का सीबीडी मैदान शामिल हैं। आदेश में कहा गया है कि गृह मंत्रालय ने प्रदर्शन के लिए दूसरी जगहों की तलाश करने के लिए एक कमेटी बनाई थी। उसी की सिफारिशों के आधार पर जंतर-मंतर को तय प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाया गया है। यह आदेश 28 अप्रैल 2022 के पुराने आदेश में कुछ बदलाव करता है। सीजेपी ने इस फैसले का विरोध किया। सौरव दास ने कहा कि यह मंजूर नहीं है और सवाल उठाया कि नरेंद्र मोदी जंतर-मंतर से डरते क्यों हैं। उन्होंने कहा कि जंतर-मंतर भारत के लोगों का है और अब पूरा देश ही जंतर-मंतर है।
जंतर-मंतर पर पहले भी लग चुकी है रोक
जंतर-मंतर पर प्रदर्शन रोकने की कोशिश पहले भी हो चुकी है। अक्टूबर 2017 में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने यहां प्रदर्शन रोकने और प्रदर्शनकारियों को रामलीला मैदान भेजने को कहा था। इसके पीछे तीन वजहें बताई गई थीं। पहली, कोई सरकारी आदेश जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल घोषित नहीं करता था। दूसरी, दिल्ली मास्टर प्लान में यह रिहायशी इलाका था। तीसरी, प्रदर्शनों से शोर का प्रदूषण होता था। लेकिन जुलाई 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने जंतर-मंतर और बोट क्लब इलाके में प्रदर्शनों पर पूरी तरह रोक लगाने के खिलाफ फैसला दिया। अदालत ने कहा कि प्रदर्शन किए जा सकते हैं, लेकिन उनका तरीका और भीड़ की संख्या तय नियमों के दायरे में होनी चाहिए।
जंतर-मंतर को हटाने की असली वजह क्या है
दिल्ली पुलिस के आदेश में जंतर-मंतर को हटाने की कोई खास वजह नहीं बताई गई है। लेकिन माना जा रहा है कि इसकी एक बड़ी वजह संसद से इसकी कम दूरी है। जंतर-मंतर संसद से सिर्फ डेढ़ किलोमीटर दूर है। जून-जुलाई में हुए धरने के दौरान प्रदर्शनकारी संसद के काफी करीब पहुंच गए थे। यही बात इस फैसले को सिर्फ प्रशासनिक मामला नहीं रहने देती। जंतर-मंतर का मकसद ही यह था कि विरोध की आवाज सत्ता तक पहुंचे। संसद, नॉर्थ ब्लॉक और साउथ ब्लॉक जैसे अहम सरकारी दफ्तर इसके करीब हैं। बोट क्लब से जंतर-मंतर तक प्रदर्शन स्थलों को सत्ता के केंद्र से धीरे-धीरे दूर किया जाता रहा है। अब तीन विकल्पों में से एक जगह 26 किलोमीटर से भी ज्यादा दूर है।
BJP ने विपक्ष के मार्च पर क्या कहा
विपक्ष और प्रदर्शन से जुड़ी गतिविधियों के बाद अब बात सत्ता पक्ष की। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने मुंबई में विपक्ष की सीजेआई से मिलने की मांग पर सवाल उठाया। उन्होंने पूछा कि संविधान में कहां लिखा है कि चीफ जस्टिस को किसी विरोध मार्च से मिलना ही होगा। केंद्रीय मंत्री और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी राहुल गांधी पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि यह शिवजी की बारात नहीं, बल्कि अराजकतावादियों की भीड़ है।
कांग्रेस सांसद पर यौन उत्पीड़न के आरोपों को लेकर BJP का प्रदर्शन
इसी बीच भाजपा की महिला मोर्चा ने कांग्रेस मुख्यालय के पास प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने जेएनयू की 11 छात्राओं को न्याय दिलाने की मांग की। उनके निशाने पर इनर मणिपुर सीट से कांग्रेस सांसद अंगोमचा बिमोल अकोइजम थे, जो पहले जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्रोफेसर थे। 11 छात्राओं ने उन पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए हैं। 9 अक्टूबर को जेएनयू ने अपनी अंदरूनी कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर उन्हें बर्खास्त कर दिया था। 11 अक्टूबर को जेएनयू के चीफ सिक्योरिटी ऑफिसर की शिकायत पर वसंत कुंज नॉर्थ थाने में भारतीय न्याय संहिता की धारा 75 और 79 के तहत एफआईआर दर्ज की गई। पुलिस मामले की जांच कर रही है। भाजपा सांसद बांसुरी स्वराज ने राहुल गांधी से सवाल किया कि क्या स्मैश द पैट्रियार्की सिर्फ एक नारा है। वहीं अकोइजम ने आरोपों से इनकार किया है। उन्होंने एक्स पर जेएनयू की वाइस चांसलर शांतिश्री डी. पंडित पर झूठ बोलने का आरोप लगाया। अकोइजम ने लिखा कि उनके गवाह 14 अगस्त को बयान दे चुके थे, उन्होंने 31 मई को लिखित जवाब दिया था और 16 जुलाई को कमेटी के सामने पेश भी हुए थे। इसके बावजूद उन पर सहयोग न करने का आरोप लगाया जा रहा है। उन्होंने पूरी कार्रवाई को विच हंट बताया और अपनी बर्खास्तगी को चुनौती भी दी है।
केरल विधानसभा में ज्ञानेश कुमार को हटाने का प्रस्ताव पास
राजनीतिक टकराव का असर केरल में भी देखने को मिला। वहां की विधानसभा ने ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग वाला प्रस्ताव पास किया। ऐसा करने वाली यह देश की पहली विधानसभा है। यह प्रस्ताव मुख्यमंत्री वीडी सतीशन ने पेश किया। 140 सदस्यों वाली विधानसभा में कांग्रेस गठबंधन के 102 विधायक हैं। 35 विधायकों वाले लेफ्ट ने भी इस प्रस्ताव का समर्थन किया। प्रस्ताव सर्वसम्मति से पास हुआ। प्रस्ताव में मांग की गई कि एसआईआर में सामने आई गड़बड़ियों को दूर किया जाए और गलत तरीके से वोटर लिस्ट से हटाए गए सभी योग्य मतदाताओं का वोट देने का अधिकार बहाल किया जाए। इसके साथ ही मांग की गई कि मुख्य चुनाव आयुक्त को चुनने वाली कमेटी में प्रधानमंत्री, लोकसभा में नेता विपक्ष और चीफ जस्टिस शामिल हों। केरल भाजपा अध्यक्ष राजीव चंद्रशेखर ने इस प्रस्ताव को गैर-कानूनी बताया। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि जो सीपीएम और कांग्रेस एक-दूसरे के विरोधी होने का दावा करते हैं, उनके 137 विधायक आज एक साथ खड़े नजर आए। उन्होंने कहा कि मामला अदालत में चल रहा है और विधानसभा ने इसे उठाकर स्थापित नियमों का उल्लंघन किया है


