Bullet Train Project भारत के आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर के इतिहास में सबसे महत्वाकांक्षी और बहुप्रतीक्षित योजनाओं में से एक माना गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जापान के तत्कालीन प्रधानमंत्री शिंजो आबे ने सितंबर 2017 में अहमदाबाद में 508 किलोमीटर लंबे मुंबई-अहमदाबाद हाई स्पीड रेल (MAHSR) कॉरिडोर की आधारशिला रखी थी। उस समय लक्ष्य रखा गया था कि देश की आजादी के 75वें वर्ष यानी 2022 तक भारत अपनी पहली बुलेट ट्रेन की सवारी करेगा। हालांकि, यह महत्वाकांक्षी योजना कई अड़चनों, विवादों और राजनीतिक खींचतान के चलते एक लंबे भटकाव की शिकार हो गई।
Bullet Train Project में देरी के मुख्य कारण क्या रहे?
इस मेगा प्रोजेक्ट की गति थमने का सबसे बड़ा कारण भूमि अधिग्रहण से जुड़ी चुनौतियां रहीं। कुल 508 किलोमीटर लंबे ट्रैक में से लगभग 348 किलोमीटर का हिस्सा गुजरात, 156 किलोमीटर का हिस्सा महाराष्ट्र और 4 किलोमीटर केंद्र शासित प्रदेश दादरा एवं नगर हवेली से होकर गुजरना था। गुजरात में भूमि अधिग्रहण का कार्य अपेक्षाकृत तेज गति से पूरा कर लिया गया, लेकिन महाराष्ट्र के पालघर और ठाणे जैसे जिलों में स्थानीय किसानों, आदिवासी समुदायों और फल उत्पादकों ने भारी विरोध प्रदर्शन किया।
भूमि अधिग्रहण के मुआवजे, पुनर्वास नीतियों और पर्यावरण मंजूरी को लेकर कई कानूनी विवाद अदालतों तक पहुंचे। इसके अलावा, मुंबई के बांद्रा-कुर्ला कॉम्प्लेक्स (BKC) में अंडरग्राउंड स्टेशन और समुद्र के नीचे से गुजरने वाली 21 किलोमीटर लंबी सुरंग के टेंडर में भी अप्रत्याशित देरी हुई। इस वजह से परियोजना का निर्माण कार्य समयसीमा से काफी पीछे छूट गया।
महाराष्ट्र की राजनीति और सत्ता परिवर्तन का असर
इस महत्वाकांक्षी परियोजना में सबसे बड़ा राजनीतिक मोड़ 2019 में महाराष्ट्र में हुए सत्ता परिवर्तन के बाद आया। राज्य में जब महा विकास अघाड़ी की सरकार बनी, तो इस रेल परियोजना को लेकर रुख पूरी तरह बदल गया। तत्कालीन मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे और गठबंधन में शामिल Congress पार्टी ने इसे प्राथमिकता सूची से बाहर करते हुए आम जनता के पैसे की बर्बादी करार दिया। राज्य सरकार ने धन आवंटन और जरूरी अनुमतियों को रोक दिया, जिससे महाराष्ट्र खंड का काम लगभग ठप पड़ गया।
हालांकि, वर्ष 2022 में महाराष्ट्र में राजनीतिक बदलाव के बाद BJP समर्थित सरकार आने पर परियोजना को पुनर्जीवित किया गया। नई सरकार ने तुरंत लंबित मंजूरियां दीं और बीकेसी स्टेशन व टनल निर्माण के टेंडर फाइनल किए गए। इस राजनीतिक उठापटक ने परियोजना की समयसीमा को कम से कम तीन से चार साल पीछे धकेल दिया।
जापान की शिंकानसेन तकनीक और जटिल मानक
इस हाई-स्पीड रेल परियोजना को जापान इंटरनेशनल कोऑपरेशन एजेंसी (JICA) द्वारा बेहद रियायती दर पर मिलने वाले ऋण के जरिए वित्तपोषित किया जा रहा है। इसके साथ ही इसमें जापान की मशहूर शिंकानसेन तकनीक का इस्तेमाल हो रहा है। जापानी सुरक्षा और गुणवत्ता के कड़े मानकों, रोलिंग स्टॉक टेंडर और सिग्नलिंग सिस्टम के तकनीकी हस्तांतरण की जटिलताओं ने भी निर्माण प्रक्रिया को धीमा किया। कोविड-19 महामारी के दौरान जापानी सलाहकारों और इंजीनियरों की अनुपस्थिति ने भी काम पर प्रतिकूल प्रभाव डाला।
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अब किस दिशा में आगे बढ़ रहा है काम?
सभी बाधाओं को पार करने के बाद अब Bullet Train Project फिर से तेज गति पकड़ चुका है। नेशनल हाई स्पीड रेल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (NHSRCL) के अनुसार गुजरात के सूरत, वडोदरा और आणंद में अधिकांश पिलर और गर्डर लॉन्चिंग का काम पूरा हो चुका है। गुजरात के सूरत-बिलिमोरा सेक्शन के बीच ट्रायल रन को 2026 तक शुरू करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
पूरी परियोजना के वर्ष 2028 तक पूरी तरह चालू होने की उम्मीद जताई जा रही है। Bullet Train Project न केवल मुंबई और अहमदाबाद के बीच की यात्रा को घटाकर दो घंटे से कम कर देगा, बल्कि यह भारत के इंजीनियरिंग सामर्थ्य और भविष्य की हाई-स्पीड कनेक्टिविटी के लिए एक नया मील का पत्थर साबित होगा।


