नागपंचमी के अवसर पर….!
“विषधर” को सब दूध पिलाते,
खूब खिलाते लावा…..
इसी बहाने मित्रों….
महादेव को खुश करने का…!
करते अपना-अपना दावा….
एक अचम्भा इधर तो देखो…
नहीं पिलाता दूध मुझे कोई..
ना ही खिलाता मावा…जबकि…
नागपंचमी तिथि का हूँ जनमा..
और….जग में…जन-मानस में…
“विषहर” ….मोरा नाम कहावा…
रचनाकार
कवि जितेन्द्र कुमार दुबे
कैथी, वाराणसी,उ.प्र.

